आँसू : जयशंकर प्रसाद (पंक्ति-व्याख्या)

“मानव जीवन वेदी पर, परिणय हो विरह मिलन का।

सुख दुख दोनों नाचेंगे, है खेल आँख और मन का ॥” 

जयशंकर प्रसादइन पंक्तियों में कवि अपने निविड़ जीवन के सुख दुखात्मक अनुभूति का चित्रण करते हुए कहता है कि जीवन  सुख और दुख की लीला भूमि है। यहाँ विरह और मिलन का परिणय हुआ करता है और शोक और आनन्द दोनों यहाँ नाचते रहते हैं ।

कवि प्रसाद को आज भी अपनी वेदना पर विश्वास है । प्रेमी के लिए सुख और दुख नियति का दान हैं। निसर्गतः दोनों में मौलिक अंतर नहीं है। केवल एक ही चेतना के दो रूप हैं। परिणय की पृष्ठ्भूमि देकर कवि प्रसाद निःसंकोच भाव से यह स्वीकार करते हैं कि संसार में विलास जीवन का वैभव आँखों में मद बनकर समाया है। वही विराट आकर्षण है, वही सुख का गठबन्धन है, किन्तु उसके अभाव में जो वेदना है, वही आँसू बनकर निकलती है।

मानव मन इस भौतिक जगत में प्रतिक्षण नयी नयी उलझनों में उलझता रहता है। वह सांसारिक जीवन जीता हुआ, आशा निराशा के क्षण जीता रहता है, मिलन विरह के गीत गाता रहता है। अब मिलन की आशा किरण उसे दिखायी देती है तो वह गाता है – चेतना लहर न उठेगी, जीवन समुद्र थिर होगा।” लेकिन निराशा के क्षण में उसका मन सहज भाव से कह बैठता है – “नाविक इस सूने तट पर, किन लहरों में खे लाया।”

कवि मानव जीवन की सम्पूर्ण विसंगतियों का पर्यालोचन करने के पश्चात भी विकल नहीं है अपितु मानवीय सुख के प्रति निष्ठावान है। कवि सुख दुख दोनों की अनुभूति प्राप्त करना चाहता है। वह सुख दुख को मन और आँख की खेल मिचौनी मानता है- “सुख दुख दोनों नाचेंगे, है खेल आँख और मन का।” 

आँख और मन का खेल सुख दुख की आँख मिचौनी कैसे? आँखों में प्रिय का सौन्दर्य समाया है अतः यही सुख है। एक स्थान पर उन्होंने लिखा है, “स्वास्थ्य सरलता तथा सौन्दर्य को प्राप्त कर लेने पर प्रेम प्याले का एक घूँट पीना पिलाना ही आनन्द है।” कवि रोजेटी (Rossetti) जैसे कहता है-

“O my love my love, if I no more shall see thyself

Nor on earth the shadow of thee,

Nor image of thine eyes in any spring,

How then should sound upon life’s darkening slope;”

अब रूप का अपलक नेत्रों से दर्शन न होना ही विरह की ज्वाला है जो ’मादक थी, मोहमयी थी, मन बहलाने की क्रीड़ा अब हृदय हिला देती है अब मधुर प्रेम की पीड़ा’। कवि प्रसाद  कवि पन्त की तरह सुख और दुख को जीवन की आँख मिचौली मानते हैं – सुख दुख की आँख मिचौनी / खोले जीवन अपना मुख ।” 

इसी प्रकार जयशंकर प्रसाद अन्तर्द्वंद्व में भी यह अभिलाषा करते हैं कि यौवन काल में दुख सुख के पालने पर झूलते रहे, वह स्थिति बनी रहे। प्रियतमा के सामीप्य के अभाव में जीवन दुखमय हो गया है, किन्तु जब वह सामीप्य लाभ प्राप्त हुआ तो दशा ही बदल गयी। इसी अन्तर्द्वंद्व में भी कवि की यही अभिलाषा है-

“मानव जीवन वेदी पर, परिणय हो विरह मिलन का।

सुख दुख दोनों नाचेंगे, है खेल आँख और मन का ॥”

’डॉ० प्रेम शंकर’ ने ठीक ही कहा है – ” जीवन पथ पर जाता हुआ मानव अन्त में एक सामंजस्य स्थापित करता है। आँसू की करुणा का यह चरमोत्कर्ष है।” 

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