प्रस्तावना (जारी…)

अपने एक निबंध कुटज में ’हजारी प्रसाद द्विवेदी ’ ने लिखा है –

“नाम में क्या रखा है, कोई भी नाम रख लो ।”

हो सकता है यह बात अधिकांश स्थानों पर सत्य हो किन्तु सर्वत्र इसकी सत्यता संदिग्ध ही है । परमात्मा के विविध नामो की चर्चा में गोस्वामी तुलसीदास ने एक कदम आगे बढ़कर अपना ’वीटो पावर’ (Veto Power) लगाया था –

“यद्यपि प्रभु के नाम अनेका । श्रुति कँह अधिक एक ते एका ।

राम सकल नामन ते अधिका । होउ नाथ अघ खग गन बधिका ।”

जहाँ तक अज्ञेय नाम का संबंध है, यह नाम भी मुझे कम अर्थवाह प्रतीत नहीं हुआ । ’अ’ वर्णमाला का पहला अक्षर, ’ज्ञ’ वर्णमाला का अंतिम अक्षर । दोनों मिलकर ’अज्ञ’ हुए । ’अ’= सम्पूर्ण । ज्ञ= ज्ञान ।

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प्रस्तावना ( लघु शोध प्रबंध )

अपने स्नातकोत्तर ’हिन्दी’ द्वितीय वर्ष के अध्ययन क्रम में पंचम प्रश्न पत्र की आवश्यकता को दृष्टिगत रखते हुए प्रस्तुत प्रबंध को परियोजना कार्य के लिये प्रस्तुत करते हुए मुझे हर्ष है । हिन्दी साहित्य का एक विशाल फलक है और हमें गर्व है कि हमारा आधुनिक हिन्दी साहित्य विश्व के श्रेष्ठ साहित्य से किसी भी … पढना जारी रखे

  • Prakarantar

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