अज्ञेय की कविता में काम – 5

अहं और काम

अज्ञेय
अज्ञेय

निःसन्देह जहाँ कवि अहं को तिरोहित हो जाने देता है वहाँ काम की बड़ी ही उत्तम अनुभूतियों में मग्न होता है। ऐसे स्थलों पर वह विरह के आघात से अपने ’प्यार को दूना’ हुआ बताता है। वह प्रेम में ’चिर ऐक्य’ का विरोधी है। ऐसे स्थलों पर वह प्रेम के वासनात्मक नहीं साधनात्मक रूप की ओर अग्रसर होता है-

प्रेम में चिर ऐक्य कोई मूढ़ होगा तो कहेगा
विरह की पीड़ा न हो तो प्रेम क्यों जीता रहेगा!

और ऐसे अवसरों पर वह घोषित करता है कि ’जिन्हें प्रेम  अनुभव-रस का कटु प्याला है वे रोगी हैं’ अथवा जिनके लिए वह ’सम्मोहनकारी हाला है’ वे मुर्दे होंगे। कवि ने तो ’आहुति बनकर देखा है’ कि ’वह तो प्रेम-यज्ञ की ज्वाला है’।

यद्यपि अज्ञेय का अहं इतना सबल और इतना अत्याज्य है कि वे प्रेम के साधनात्मक रूप में अपने को बहुत अधिक तन्मय नहीं कर पाते और नारी को भिन्न रूप में पाने की अभिलाषा प्रकट करते हैं। उनकी बौद्धिकता भी इस प्रकार की अभिव्यंजना को प्रभावित करती है। उनका क्षणवाद भी- “खग-युगल करो सम्पन्न प्रणय क्षण के जीवन में हो तन्मय” उनकी इस प्रकार की भोग वृत्ति और प्रकृतिवादिता (Naturalism) को प्रश्रय देता है। वह याद को पराजय मानने लगते हैं-

भोर वेला नदी तट की घंटियों का नाद
चोट खाकर जग उठा सोया हुआ अवसाद
नहीं मुझको नहीं अपने दर्द का अभिमान
मानता हूँ मैं पराजय है तुम्हारी याद

उसके ग्रन्थि-जटिल मन में अनेक शंकायें उठने लगती हैं-

अब तक हम थे बन्धु
सैर को आये
और रहे बैठे तो
लोग कहेंगे
धुंधले में दुबके प्रेमी बैठे हैं
वह हम हों भी
तो यह हरी घास ही जाने।

अज्ञेय ने नारी के रूपांकन की अनेक रचनायें प्रस्तुत की हैं। रूपांकन में उन्होंने पारम्परिक उपमानों को तो छोड़ दिया है, छायावादी प्रतीकों और उपमानों को भी पीछे छोड़ने की कोशिश की है। इन समस्त वर्णनों में उनकी मूल भावना शारीरिक आकर्षण की है। ’कलगी बाजरे की’ शीर्षक रचना में वे कहते हैं कि ’अगर मैं तुमको ललाती साँझ के नभ की अकेली तारिका’ या ’शरद के भोर की नीहार न्हायी कुई’ या ’टटकी कली चम्पे की’ नहीं कहता तो केवल इसलिए कि ’ये उपमान मैले हो गए हैं’ तथा ’इन प्रतीकों के देवता कूच कर गए हैं’। और इस दृष्टिकोण के अनुरूप नव्यतर और सहज उपमानों के माध्यम से नारी के उस रूप को व्यक्त किया है जिसके प्रति वह निवेदित, समर्पित और कभी-कभी उन्मथित है-

अगर मैं यह कहूँ
बिछली घास हो तुम
लहलहाती हवा में कलगी छरहरी बाजरे की
या शरद के साँझ के सूने गगन की पीठिका पर
दोलती कलगी अकेली
बाजरे की
और जब जब देखता हूँ
यह खुला वीरान संस्कृति का घना हो सिमट आता है
और मैं एकांत होता हूँ
समर्पित। (हरी घास पर क्षण भर)

नख-शिख रीतिशास्त्र का बड़ा प्रसिद्ध शब्द है। उस रीतियुगीन नख-शिख के अन्तर्गत आने वाले प्रत्येक अंग का उपमान स्थिर हो चुका था। अज्ञेय ने ’नख-शिख’ नामक अपनी कविता में रूढ़ उपमानों को यदि कहीं लिया भी है तो संदर्भ (Context) और सम्बन्ध (Association) बदल दिया है-

तुम्हारी देह
मुझको कनक-चम्पे की कली है
दूर से ही
स्मरण में भी गंध देती है
(रूप स्पर्शातीत वह जिसकी लुनाई कुहासे-सी चेतना को मोह ले)
तुम्हारे नैन
पहले भोर की दो ओस बूँदें हैं
अछूती ज्योतिर्मय
भीतर द्रवित
(मानो विधाता के हृदय में जग गई हो भाप करुणा की)
तुम्हारे होंठ
पर उस दहकते दाड़िम पुहुप को
मूक तकता रह सकूँ मैं
(सह सकूँ मैं ताप ऊष्मा का मुझे जो लील लेती है।) -(बावरा अहेरी)

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