अज्ञेय की कविता में काम – 6

अज्ञेयक्षणवादी अज्ञेय

अज्ञेय क्षणवादी हैं। क्षण के भीतर प्रवहमान व्याप्त सम्पूर्णता के भोक्ता हैं। क्षण की सम्पूर्णता में व्याप्त मानव की अनारोपित समग्रता स्वाभाविकता अज्ञेय के कवि का इष्ट है और इस रूप में वे नए बोध के संवाहक हैं। सौंदर्यानुभूति का प्रेमपूर्ण क्षण कवि की आत्मोपलब्धि है-

“और सब पराया है
बस इतना क्षण अपना
तुम्हारी पलकों का कँपना।”

उनका कवि मन के उदात्तीकरण की बात सोच सकता, वह भी प्रेम के शरीर रूप को स्वीकार करते हुए, और मन के विजय के किसी अहं को बिना पाले वह कहता है-

“जहाँ पर मन
नहीं रहे यज्ञ का दुर्दान्त घोड़ा
जिसे लौटा तुझे दे
मैं समर्थ जभी कहाऊँ।

वासना के प्रति उसकी स्थिति यही है-

“मैं दम साधे रहा
मन में अलक्षित
आँधी मचती रही

प्रातः बस इतनी कि मेरी बात
सारी रात
उघड़ कर वासना का
रूप लेने से बचती रही।”

प्यार के प्रति उनका असीम विश्वास है, सकारण-

“क्या कहीं प्यार से इतर
ठौर है कोई
जो इतना दर्द सँभालेगा?
पर मैं कहता हूँ
अरे आज पा गया प्यार मैं वैसा
दर्द नहीं अब मुझको सालेगा।”  (अरी ओ करुणा प्रभामय)

अज्ञेय ने युगों-युगों की संचित प्रेम-कामना को एक क्षण में घनीभूत कर दिया है। यह शिखा प्रेम की शिखा है, वासना की नहीं, यद्यपि जलाती यह भी उसी प्रकार है जिस प्रकार वासना जलाती है-

“और तब संकल्प मेरा
द्रवित. आहत,
स्नेह-सा उत्सृष्ट होता है
शिखा के प्रति
धीर संशयहीन, चिन्तातीत।
वह चाहे जला डाले।
(यद्यपि वह तो वासना का धर्म है-
और यह नन्हीं शिखा तो
अनकहा मेरे हृदय का प्यार है।)”

प्रेमानुभूति के क्षण की प्रकृति को अभिव्यक्त करते हुए कवि कहता है कि यह एक प्राकृतिक अनुभूति है और अनिवार्यतः आनन्दमयी है। इसे किसी भी रूप में पाप नहीं कहा जा सकता है। हाँ, इसके सहज मार्ग को रोकना ही पाप है, शाप है। कवि दुनिया की इस राह में प्रेम और वासना के प्रत्येक क्षण का उपभोग कर आगे बढ़ जाना चाहता है-

“प्रकृत है अनुभूति, वह रसदायिनी निष्पाप भी है
मार्ग उसका रोकना ही पाप भी है, शाप भी है
मिलन हो मुख चूम लें, आयी विदा, लें राह अपनी-
मैं न पूछूँ, तुम न जानो, क्या रहा अंजाम मेरा।”

आलिंगन का एक क्षण उसे ऐसा लगता है, मानो उसने सम्पूर्ण सृष्टि को एक क्षण के लिए अपनी भुजाओं में बाँध लिया हो-

“सृष्टि भर को एक क्षण भर बाहुओं ने बांध घेरा।”

सुनहले शैवाल की ’निर्झर’ कविता में कवि ने प्रेमानुभूति में उठने वाले आन्तरिक कोलाहल का निर्झर के कोलाहल से तादात्म्य स्थापित करते हुए कहा है-

“आओ, इस अजस्र निर्झर के तट पर
प्रिय, क्षण भर हम नीरव
रहकर इसके स्वर में लय कर डालें
अपने प्राणों का यह अविरल रौरव।”

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अज्ञेय की कविता में काम – 5

अहं और काम

अज्ञेय
अज्ञेय

निःसन्देह जहाँ कवि अहं को तिरोहित हो जाने देता है वहाँ काम की बड़ी ही उत्तम अनुभूतियों में मग्न होता है। ऐसे स्थलों पर वह विरह के आघात से अपने ’प्यार को दूना’ हुआ बताता है। वह प्रेम में ’चिर ऐक्य’ का विरोधी है। ऐसे स्थलों पर वह प्रेम के वासनात्मक नहीं साधनात्मक रूप की ओर अग्रसर होता है-

प्रेम में चिर ऐक्य कोई मूढ़ होगा तो कहेगा
विरह की पीड़ा न हो तो प्रेम क्यों जीता रहेगा!

और ऐसे अवसरों पर वह घोषित करता है कि ’जिन्हें प्रेम  अनुभव-रस का कटु प्याला है वे रोगी हैं’ अथवा जिनके लिए वह ’सम्मोहनकारी हाला है’ वे मुर्दे होंगे। कवि ने तो ’आहुति बनकर देखा है’ कि ’वह तो प्रेम-यज्ञ की ज्वाला है’।

यद्यपि अज्ञेय का अहं इतना सबल और इतना अत्याज्य है कि वे प्रेम के साधनात्मक रूप में अपने को बहुत अधिक तन्मय नहीं कर पाते और नारी को भिन्न रूप में पाने की अभिलाषा प्रकट करते हैं। उनकी बौद्धिकता भी इस प्रकार की अभिव्यंजना को प्रभावित करती है। उनका क्षणवाद भी- “खग-युगल करो सम्पन्न प्रणय क्षण के जीवन में हो तन्मय” उनकी इस प्रकार की भोग वृत्ति और प्रकृतिवादिता (Naturalism) को प्रश्रय देता है। वह याद को पराजय मानने लगते हैं-

भोर वेला नदी तट की घंटियों का नाद
चोट खाकर जग उठा सोया हुआ अवसाद
नहीं मुझको नहीं अपने दर्द का अभिमान
मानता हूँ मैं पराजय है तुम्हारी याद

उसके ग्रन्थि-जटिल मन में अनेक शंकायें उठने लगती हैं-

अब तक हम थे बन्धु
सैर को आये
और रहे बैठे तो
लोग कहेंगे
धुंधले में दुबके प्रेमी बैठे हैं
वह हम हों भी
तो यह हरी घास ही जाने।

अज्ञेय ने नारी के रूपांकन की अनेक रचनायें प्रस्तुत की हैं। रूपांकन में उन्होंने पारम्परिक उपमानों को तो छोड़ दिया है, छायावादी प्रतीकों और उपमानों को भी पीछे छोड़ने की कोशिश की है। इन समस्त वर्णनों में उनकी मूल भावना शारीरिक आकर्षण की है। ’कलगी बाजरे की’ शीर्षक रचना में वे कहते हैं कि ’अगर मैं तुमको ललाती साँझ के नभ की अकेली तारिका’ या ’शरद के भोर की नीहार न्हायी कुई’ या ’टटकी कली चम्पे की’ नहीं कहता तो केवल इसलिए कि ’ये उपमान मैले हो गए हैं’ तथा ’इन प्रतीकों के देवता कूच कर गए हैं’। और इस दृष्टिकोण के अनुरूप नव्यतर और सहज उपमानों के माध्यम से नारी के उस रूप को व्यक्त किया है जिसके प्रति वह निवेदित, समर्पित और कभी-कभी उन्मथित है-

अगर मैं यह कहूँ
बिछली घास हो तुम
लहलहाती हवा में कलगी छरहरी बाजरे की
या शरद के साँझ के सूने गगन की पीठिका पर
दोलती कलगी अकेली
बाजरे की
और जब जब देखता हूँ
यह खुला वीरान संस्कृति का घना हो सिमट आता है
और मैं एकांत होता हूँ
समर्पित। (हरी घास पर क्षण भर)

नख-शिख रीतिशास्त्र का बड़ा प्रसिद्ध शब्द है। उस रीतियुगीन नख-शिख के अन्तर्गत आने वाले प्रत्येक अंग का उपमान स्थिर हो चुका था। अज्ञेय ने ’नख-शिख’ नामक अपनी कविता में रूढ़ उपमानों को यदि कहीं लिया भी है तो संदर्भ (Context) और सम्बन्ध (Association) बदल दिया है-

तुम्हारी देह
मुझको कनक-चम्पे की कली है
दूर से ही
स्मरण में भी गंध देती है
(रूप स्पर्शातीत वह जिसकी लुनाई कुहासे-सी चेतना को मोह ले)
तुम्हारे नैन
पहले भोर की दो ओस बूँदें हैं
अछूती ज्योतिर्मय
भीतर द्रवित
(मानो विधाता के हृदय में जग गई हो भाप करुणा की)
तुम्हारे होंठ
पर उस दहकते दाड़िम पुहुप को
मूक तकता रह सकूँ मैं
(सह सकूँ मैं ताप ऊष्मा का मुझे जो लील लेती है।) -(बावरा अहेरी)

अज्ञेय की कविता में काम-4

agyey
अज्ञेय

प्रेम की उत्पत्ति का कारण रूप है और सौन्दर्य की तीव्रानुभूति जब प्रेम को जन्म देती है तो व्यक्ति उसमें अपने आपको भूल जाता है। जब तक व्यक्ति बौद्धिक स्तर पर सचेत जीवन जीता है, आत्मस्थ नहीं होता। उसके जीवन का कोई भी क्षण पूरी तरह अपना नहीं होता परन्तु किसी विशिष्ट मुद्रा में अपने आपको एक क्षण के लिए खो देना ही मानो अपने आपको पा लेना है-आत्मोपलब्धि है। कवि किसी नवयौवना सुन्दरी को पलक काँपते देखता है और उसकी इस मुद्रा का क्षण उसको पूर्णतः आकर्षित करता है। सोचता है, नायिका अपने यौवन की कल्पनाओं में मस्त होकर लज्जा का अनुभव होने पर पलक कँपाती है। सौन्दर्यानुभूति का यही प्रेमपूर्ण क्षण कवि की आत्मोपलब्धि है-

और सब पराया है
बस इतना क्षण अपना
तुम्हारी पलकों का कँपना।

ऐसे समय कवि की अभिलाषा है कि वह सुन्दरी के स्वप्न में एक क्षण के लिए स्थान पा सके-

है मेरा इष्ट तुम्हारे उस सपने का कण होना।

काम एक ईश्वरीय शक्ति-

अज्ञेय ने ’काम’ को ईश्वरीय शक्ति माना है। यही सबसे रहस्यपूर्ण शक्ति है। यही सबसे ’मिस्टीरियस फोर्स’ – Mysterious Force है। उनका निदर्शन है- डरो मत, भयभीत न हो। जीवन के किसी भी अनुभव से कभी भयभीत मत होना। जीवन के सब रंग भोगो, जीवन के सब ढंग जीओ। जीवन के सारे आयाम तुम्हारे परिचित होने चाहिए-

सत्य का वह सनसनाता तीर जा पहुँचा हृदय के पार
खोल दो सब वंचना के दुर्ग के ये रुद्ध सिंहद्वार।  –(मुक्त है आकाश)

अज्ञेय का मन्तव्य है कि आज मनुष्य की संवेदनायें बदल गयी हैं। वह विचारों के अन्तर्द्वन्द्वों से विशेषतः यौन वर्जनाओं से ग्रस्त है- “आधुनिक युग का साधारण व्यक्ति यौन व्यंजनाओं का पुंज है। उसके जीवन का एक पक्ष है उसकी सामाजिक रुढ़ि की लम्बी परम्परा जो परिस्थितियों के साथ-साथ विकसित नहीं हुई, और दूसरा पक्ष है स्थिति परिवर्तन की असाधारण तीव्र गति जिसके साथ रूढ़ि का विकास असम्भव है। इस विपर्याय का परिणाम है कि आज के मानव का मन यौन-परिकल्पनाओं से लदा हुआ है और ये कल्पनायें सब दमित और कुण्ठित हैं। उसकी सौन्दर्य चेतना भी इससे आक्रान्त है। उसके उपमान सब यौन प्रतीकार्थ रखते हैं।”

अतः अपनी अभिव्यक्ति के लिए अज्ञेय ने यौन प्रतीकों का प्रचुरता से प्रयोग किया है। सावन के मेघ का वर्णन इसी प्रकार के प्रयोग से युक्त है-

घिर गया नभ, उमड़ आये मेघ काले,
भूमि के कम्पित उरोजों पर झुका-सा
विशद, श्वाँसाहत, चिरातुर
छा गया इन्द्र का नील वक्ष-
वज्र-सा, यदि तड़ित से झुलसा हुआ-सा।

भूमि नायिका को निर्लज्ज और नंगी रूप में चित्रित किया जाता है तब तो, मानो युग की सारी यौन कुंठायें साकार हो उठती हैं-

स्नेह से आलिप्त
बीज के भवितव्य से उत्फुल्ल,
बद्ध-
वासना के पंक-सी फैली हुई थी
धारयित्री सत्य-सी निर्लज्ज, नंगी
औ’ समर्पित!

वर्ग-भावना की विषमता का वर्णन भी कवि ने यौन-प्रतीकों से किया है-

हम लोगों का एकमात्र श्रम है- सुरति श्रम
इस अन्त्यज का एकमात्र सुख है – मैथुन सुख।

देह का आकर्षण कम सम्मोहक थोड़े हीहै। अज्ञेय ने सुनहले शैवाल में एक कविता संकलित की है-’देह वल्ली’। उसमे रूप नाम-हीन को ’आँखों में समेट लो’- यह पुकार है-

देह-
वल्ली।
रूप को
एक बार बेझिझक देख लो।
पिंजरा है? पर मन इसी में से उपजा।
जिस की उन्नीत शक्ति आत्मा है।
देखो देह-
वल्ली।

अज्ञेय का प्रेम वासना मिश्रित है इसमें उनका विश्वास है। यह दूसरी बात है कि कभीं-कभीं वह इस मनःस्थिति में हों कि कहें-

बाहु मेरे घेर कर तुमको रुके रहे
दो लताओं के प्रलम्बित अंकुरों से
प्राण दोनों के बस झुके रहे
सहज अनुरागी
नहीं मुझमें अहं की अभिव्यंजना जागी। (इत्यलम्)

क्रमशः–

अज्ञेय की कविता में काम-3

प्रेमानुभूति

अज्ञेय
अज्ञेय

अज्ञेय के लिए काम अथवा प्रेम का मतलब है पल पल जीना। प्रेम का मतलब है आज मैं आपको प्रेम करता हूँ कल का क्या भरोसा? प्रेम को अज्ञेय का कवि मौत के क्षण में भी अन्वेषित और अपने हेतु उपलब्ध करता है। मृत्यु व्यक्ति की होती है, लेकिन प्रेम की आदर्श स्थिति में व्यक्तित्व होते ही नहीं, फिर मृत्यु किसकी होगी? प्रेम व्यक्ति को उसके अहं से मुक्त करता है; उसकी मर्त्य नियति से ऊपर उठाता है; इसलिए हम उतना ही जीते हैँ जितना कि प्रेम करते हैं। प्रेम आत्मदान और आत्माहुति में है इसलिए जिसने प्रेम किया वह स्वयं को समाप्त करके ही ऐसा करता है। उसे मृत्यु का स्वाद जीवन भर मिलता रहता है। उसके लिए हर बीत गया क्षण मृत्यु है और हर भोगा जाता हुआ वर्तमान क्षण जीवन है। अज्ञेय प्रेम को, काम को, अनुराग को मृत्यु के भय के प्रत्याख्यान का माध्यम बनाते हैँ। 1936 में दिल्ली के एक कवि सम्मेलन में सुनायी गयी कविता “मैं तुम्हारे ध्यान में हूँ” ऐसी ही एक कविता है –

क्यों डरूँ मैँ मृत्यु से या क्षुद्रता के शाप से भी?
क्यों डरूँ मैँ क्षीण पुण्या अवनि के संताप से भी?
व्यर्थ जिस को मापने में है विधाता की भुजायें –
वह पुरुष मैं, मर्त्य हूँ पर अमरता के मान में हूँ।
मैं तुम्हारे ध्यान में हूँ।

अज्ञेय गहनतम प्रेमानुभूति में अपने को डुबा देना चाहते हैं और उनके लिए क्षण भर की गहरी प्रेमानुभूति किसी भी अन्य बाह्य वस्तु की अपेक्षा अधिक महत्व रखती है। प्रेम सबसे बड़ी कला है। उससे बड़ा कोई ज्ञान नहीं है। प्रेम में ही अंतर्गृह में प्रवेश करते हैं। स्थिति यह है कि अपनी कविता ‘क्षण  भर सम्मोहन छा जाये’ में वे चाहते हैं कि बस एक क्षण प्रेमानुभूति का मिल जाय और चाहे उस क्षण के बाद क्रूर काल प्रलय के बादलों की वर्षा ही क्यों न कर दे, वे उसको भी सहन कर लेंगे –

एक निमिष भर बस।
फिर विधि का घन प्रलयंकर बरसा आवे,
क्रूर काल-कर का कराल शर मुझको तेर वर-सा आवे।
क्षण भर सम्मोहन छा जावे।

प्रेमानुभूति के किसी भी क्षण को वह खोना नहीं चाहता क्योंकि उसको विरह में बदलते देर नहीं लगती। मिलन में सातत्य नहीं होता परंतु उसके क्षण में तड़ित सी तीव्रता होती है –

और होगा मूर्ख जिसने चिर मिलन की आस पाली –
‘पा चुका-अपना चुका’- है कौन ऐसा भाग्यशाली?
इस तड़ित को बाँध लेना देव से मैंने न माँगा-
मूर्ख उतना हूँ नहीं इतन नहीं है भाग्य मेरा।

और यह मिलन का क्षण कितना अल्प होता है इसकी ओर ध्यान खींचते हुए कवि कहता है –

श्वांस की हैँ दो क्रियायें-खींचना, फिर छोड़ देना,
कब भला सम्भव हमें इस अनुक्रम को तोड़ देना?
श्वास की उस सन्धि सा है इस जगत में प्यार का पल
रुक सकेगा कौन कब तक बीच पथ में डाल डेरा।

इसीलिए वह इस क्षण को व्यर्थ न गंवा कर मिलन के सुख से इस क्षण को यादगार बना लेना चाहता है। इस प्रकार के भाव उनकी कविता ‘उषा के समय’ में मिलते हैं कि अभी जो हमारे मिलन के सुख के क्षण हैं कल वे प्रातं केवल एक स्वप्न बन कर रह जायेंगे, उनकी यादगार ही हमारे पास शेष बचेगी, तो क्यों न हम इस प्रणय के क्षण को पूरी तरह जी लें-

ये सब चिर-वांछित सुख अपने
बाद उषा के होंगे
सपने फिर भी इस क्षण के गौरव में हम तुम हों-अम्लान।

क्रमशः —

अज्ञेय की कविता में काम-2

अज्ञेय

’चिन्ता’ की कवितायें

अज्ञेय की काव्य-उर्मि पार्थिव जगत की समग्रता को ग्रहण करती है। एक उर्जस्वित उर्जा, जीवन की सर्वाधिक महत्वपूर्ण उर्जा का स्फुलिंग ही काम है। काम शिखरारोहण करते करते प्रेम बन जाता है। ’विद्यानिवास मिश्र’ ने कहा है कि अज्ञेय के काम या प्रेम में “जीवन रस का आचमन हाथ से नहीं, होठों से करने का भाव है”। अज्ञेय के ’भग्नदूत’, ’चिन्ता’ व ’इत्यलम’ की कविताएँ मिलकर काम का तानाबाना बनाती हैं । ’रामस्वरूप चतुर्वेदी’ ने अज्ञेय के काम-प्रेमोद्वेलित काव्य कृतियों को एक भटकन माना है, किन्तु लगभग तेरह वर्ष और संख्या की दृष्टि से लगभग तीन सौ कवितायें भावबोध के स्तर पर अज्ञेय की काव्ययात्रा के महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं। ये कामानुभूति-सौन्दर्यानुभूति की प्रेरक रचनायें शेखर की बात याद दिलाती हैं –

“और तब दीखता है कि मेरी भटकन में भी एक प्रेरणा थी जिसमें अन्तिम विजय का अंकुर था, मेरे अनुभव वैचित्र्य में भी एक विशेष रस की उपभोगेच्छा थी जो मेरा निर्देश कर रही थी।”

’चिन्ता’ की कवितायें जीवन्त आवेग की सच्चाई को, अनुभव के तथ्यों को पकड़ती हैं। कुछ कवितायें ’प्रसाद’ के प्रभाव को स्पर्श करती हैं और अनुभूति में दर्शन को घुला देने की राह दिखा रही हैं। प्रसाद की बिम्ब योजना-

“तुम हो कौन और मैं क्या हूँ
इसमें क्या है धरा, सुनो
मानस जलधि रहे चिर-चुम्बित
मेरे क्षितिज उदार बनो।”

इनका सम्बन्ध ’चिन्ता’ की तीसरी कविता की इन पंक्तियों से जुड़ता है-

“परिचय परिणय के बन्धन से
भी घेरूँ मैं तुमको क्यों?
सृष्टि मात्र के वांछनीय सुख!
मेरे भर हो जाओ क्यों?”

’चिन्ता’ की भूमिका में अज्ञेय का कथन है- “पुस्तक के दो खण्डों में क्रमशः पुरुष और स्त्री के दृष्टिकोण से मानवीय प्रेम के उद्भव, उत्थान, विकास, अन्तर्द्वन्द्व, ह्रास, अन्तर्मन्थन, पुनरुत्थान और चरम सन्तुलन की कहानी कहने का यत्न किया गया है। कहानी वर्ण्य विषय की भाँति अनगढ़ है और जैसे प्रेम-जीवन के प्रसंग गद्यपद्यमय होते हैं वैसे ही यह कहानी भी गद्यपद्यमय है।”

चिन्ता का फलक नारी और पुरुष के सम्बन्धों का प्रतिफलन है। पुरुष ने जीवन भर स्त्री को एक सुन्दर पत्थर ही समझा और अन्त में उसे ज्ञात हुआ कि वह एक प्रज्ज्वलित हृदय है-

“तब मैने उसके ताप में ही अपनी
प्रस्तर प्रतिमा गला डाली और एक नयी
प्रतिमा का निर्माण किया और यह नयी प्रतिमा
थी एक स्त्री, मेरी प्रेयसी, विश्वप्रिया।”

लोचनयुत होकर भी उनको हम प्रज्ञाचक्षु ही कहेंगे जो अज्ञेय की उद्दाम प्रेमाभिलाषा पर मुँह विचकाते हैं और अज्ञेय की प्रच्छन्न ही सही किन्तु अन्त तक बनी आन्तरिक प्रणय की लय, आन्तरिक तड़प, एकान्त सन्नाटे का विरह और गर्व तथा आकर्षण की ओर पीठ करके बैठ जाते हैं। चिरन्तन पुरुष अज्ञेय के मन्तव्यों का प्रवक्ता बनकर कहता है- “प्रेम में बन्धन नहीं है। जो प्रिय वस्तु को स्वायत्त करने की इच्छा होती है -वह इच्छा जिसे हम प्रेम का आकर्षण कहते हैं -वह केवल हमारी समाजिक अधोगति का एक गुबार है।” महादेवी जी के काव्यगत ’प्रियतम’ को तम के परदे में आना भाता है और ’अज्ञेय’ ने यही दशा एक प्रियतमा की बताई है जो सभी कार्य गुप्त रीति से करके अन्तर्धान हो जाती है –

“छिपे आई हो मन्दिर द्वार
छिपे ही भीतर किया प्रवेश
*    *   *    *   *    *     *       *
तुम्हें अनदेखे देकर भेंट
तिमिर में हूँगी अन्तर्धान।”

चिन्ता के प्रणयी पुरुष ने प्रेम के सम्बन्ध में यह वक्तव्य दिया है – “दीपक के जीवन में कई ऐसे क्षण आते हैं जब वह अकारण ही, या किसी अदृश्य कारण से एकाएक अधिक दीप्त हो उठता है, पर वह सदा उसी प्रोज्ज्वलतर दीप्ति से नहीं जल सकता। प्रेम के जीवन में भी कई ऐसे क्षण आते हैं जब अकस्मात ही उसका आकर्षण दुर्निवार हो उठता है, पर वह सदा उसी खिंचाव को सहन नहीं कर सकता। फिर प्रियतम! हम क्यों कहते हैं सदा इस उर्ध्वगामी ज्वाला की उच्चतम शिखा पर आरूढ़ होना।” अद्भुत है अज्ञेय का काम-प्रेम आह्वान!

“आ जाना प्रिय आ जाना!
अपनी एक हँसी में मेरे आँसू लाख डुबा जाना।
हा! हृतन्त्री का तार तार, पीड़ा से झंकृत बार बार
कोमल निज नीहार-स्पर्श से उसकी तड़प सुला जाना।
फैला वन में घन अन्धकार, भूला मैं जाता पथ प्रकार –
जीवन के उलझे बीहड़ में दीपक एक जला जाना ।
सुख-दिन में होगी लोकलाज, निशि में अवगुंठन कौन काज?
मेरी पीड़ा के घूँघट में अपना रूप दिखा जाना।
दिनकर-ज्वाला को दूँ प्रतीति? जग-जग, जल-जल काटी निशीथ
ऊषा से पहले ही आकर जीवन दीप बुझा जाना।
प्रिय आ जाना।”

—-क्रमश:

भूमिका-३ (लघु शोध-प्रबंध)

स०ही०वा०’अज्ञेय’

अज्ञेय की काव्ययात्रा नयी कविता की यात्रा है । इससे निर्मित मार्ग कितने ही चरणों से चुम्बित और स्पर्शित होकर आगे बढ़ता गया है । कितने ही नये कवि इसकी सही पहचान कर सके और कितने ही इस पर चलकर अब झुठला रहे हैं । कविता में अज्ञेय ने जो मानदंड अपनाया है, जो लीक पकड़ी है वह अज्ञेय लगती हो पर अप्रिय नहीं लगती  । कवि का व्यक्तित्व झाँक लेने के बाद लगे हाथ यह मन होता ही है कि उसके कृतित्व का भी विहंगावलोकन कर लें ।

हिन्दी काव्य की विजयिनी कीर्ति-वसुंधरा का अज्ञेय नामधारी कवि ऐसा दूत है-’भग्नदूत’, जो अपनी ’चिन्ता’ को ’इत्यलम’ कहकर विरम नहीं गया, बल्कि ’हरी घास पर क्षण भर ’ बैठकर वह ’बावरा अहेरी’ कलेजा दबाये एकटक देखता रहा – पड़े हैं सामने ’इन्द्रधनु रौंदे हुए ये’ । उठे उसके सजल नेत्र ऊपर । कभीं आँखें पसारकर, कभीं आँखें बंदकर फूट पड़ा वह अस्तित्व-सर्जन के आगे – ’अरी ओ करुणा प्रभामय !’ ’आँगन के पार द्वार’ का संधान करा दे । वह ’कितनी नावों में कितनी बार’ बैठकर आता है । ’सागर-मुद्रा’ में ’महावृक्ष के नीचे’ बैठकर उद्घोषणा करता है – ’पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ’ क्योंकि मैं जानता हूँ कि किसी ने ’ऐसा कोई घर देखा है ’।

कवि ’विश्वप्रिया ’ के पाँवों पड़ा, ’सांध्यतारा’ से, प्रातः रवि से, अस्तंगत सविता से, उछलती मछली से, लहरती झील से, अंतःसलिला सरिता से, उमड़ती सागर बेला से, बासन्ती झुरमुट से, बाजरे की कलगी से, आँगन के द्वार से, द्वारहीन द्वार से, रूप अरूप से, चक्रान्त शिला से, असाध्य-वीणा से – किससे, किससे नाता नहीं जोड़ता है, कहाँ-कहाँ नहीं रोता है, निज को कहाँ-कहाँ नहीं खोता है, और जो चिन्तन प्रसूत रत्न संग्रह करता है प्रेम से उसे लुटा देता है । अज्ञेय की काव्य-यात्रा को इस तरह अपनी रचनाओं में निम्न पड़ाव देखने पड़े हैं –

  1. चिन्ता (१९४२)
  2. इत्यलम (१९४६)
  3. हरी घास पर क्षणभर (१९४९)
  4. बावरा अहेरी (१९५५)
  5. इन्द्रधनु रौंदे हुए ये (१९५७)
  6. अरी ओ करुणा प्रभामय ! (१९५९)
  7. आँगन के पार द्वार (१९६१)
  8. कितनी नावों में कितनी बार (१९६७)
  9. क्योंकि मैं उसे जानता हूँ (१९६९)
  10. सागर मुद्रा (१९७०)
  11. पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ (१९७४)
  12. महावृक्ष के नीचे (१९७७)
  13. नदी की बाँक पर छाया (१९८१)
  14. ऐसा कोई घर देखा है (१९८६)

इस प्रकार उनका काव्य सब प्रकार की विरोधी और साम्य युक्तियाँ लेकर चला है और सब उनमें सहज ही आ गये हैं  क्योंकि वे अज्ञेय जो हैं । उनके कृतित्व-व्यक्तित्व को विराम दे रहा हूँ डॉ० विद्यानिवास मिश्र के शब्दों के साथ –

“अन्तःस्मित अन्तःसंयत हरी घास की तरह नमना, ’खुल-खिलना’, ’सहज मिलना’ , एक साथ इतिहास, अपने चेहरे, परम्परा, मुकुट, बालकों के भवितव्य के भोले विश्वास के प्रति उत्तरदायित्व अपने ऊपर ओढ़ लेना, ’इयत्ता की तड़प के साथ उछली हुई मछली को सागर के सन्दर्भ में आँकना’ ’सीमाहीण खुलेपन’ के लिये प्रयत्न करते हुए भी ’विशाल में बह न सकने’ की असमर्थता का ज्ञान, शब्द को ’नैवेद्य’ मान कर बाँटते हुए भी ’मौन की अभिव्यंजना’ मानना, ’जीवन की धज्जियाँ उड़ाकर भी ’ जीवन के लिये पने को निरन्तर उत्सर्ग करते रहना, आशा के बिना भी निरांतक रह सकना – ये गुण अज्ञेय में आकस्मिक नहीं हैं ।”

जारी …..

भूमिका-२ (लघु शोध प्रबंध)

’धर्मवीर भारती’ ’कुछ चेहरे कुछ चिन्तन’ में सन्नाटे का छन्द नामक फिल्म का उद्धरण देते हुए कहते हैं –

"एक समुद्र है । कहाँ का है, कुछ पता नहीं चलता । पुरी का समुद्र होता तो विराट सर्पाकार लहरें उमड़-उमड़कर इस तरह लपकतीं मानो सारी पृथ्वी को निगल जायेंगी, बम्बई का समुद्र होता तो लहरें जरा घूम कर आतीं, तट का कूड़ा-कर्कट, तिनके, कागज, पत्ते बटोर कर ले जातीं और छोड़ जातीं कुछ सीपियाँ, कुछ घोंघे, कुछ मछलियों के पंख; कोवालम का समुद्र होता तो दूर तक फैली रेत को किनारे-किनारे से छूता, सहमता, बीच के रेतीले द्वीपों में शर्माया सा खड़ा रहता – पर यह तो पता नहीं कहाँ का समुद्र है, दायें  बायें चट्टानें हैं – लम्बी, पतली पत्थर की शहतीरों जैसी, जिनमें गहरा नीला सागर जल फँसा हुआ । उस जल में ज्वार की उत्ताल तरंग नहीं, लहरीली हलचल मात्र है, जो कहीं जाती नहीं, कहीं से आती नहीं बस अपनी ही जगह पर जड़ी हुई, गतिशील नहीं, केवल स्पन्दनशील है । लेकिन जो सागर ध्वनि सुनायी पड़ती है वह शिलाओं से घनघोर टक्कर लेते तूफानी समुद्र की है । मानों शिलाओं के नीचे भूकम्प की गड़गड़ाहट हो, ऊपर समुद्र की दहाड़ । उस उच्छॄंखल बड़बोले शोर को दबाटि हुई एक सौम्य, सुस्पष्ट और सधी हुई आवाज और फिर आकृति उभरती है – अज्ञेय की । वे पढ़ रहे हैं अपनी कविता – "मैं एक तनी हुई रस्सी पर नाचता हूँ ।"

भारती जी आगे लिखते हैं – "इस चित्र में अज्ञेय स्वयं अपने बारे में कुछ बातें करते हैं  । कुछ व्याख्यायें, कुछ संस्मरणात्मक  आत्मकथ्य, कुछ प्रतिवाद, कुछ स्पष्टीकरण ……. अपने वक्तव्य में अज्ञेय बताते हैं कि सबसे पहली और महत्वपूर्ण चीज जो उनके साथ घटी, वह थी उनके नितान्त अकेले बचपन की अनुभूति । वे कई भाई बहन थे । उनके पिता श्री हीरानन्द शास्त्री प्रख्यात पुरातत्त्ववेत्ता थे और अक्सर वे कैम्प डालकर खुदाई जहाँ चल रही हो ऐसे निर्जन स्थानों में रहते थे । सच्चिदानन्द को पिता के साथ यात्राओं पर जाने का शौक था । उन निर्जन स्थानॊ पर खुदे हुए टीलों के पास पहाड़ी की ढलान पर, नदी के किनारे घण्टों चुपचाप बैठा रहता था यह बच्चा । आसपास न कोई आदमी न कोई आदमजाद । सिर्फ सन्नाटा बुनती हवा, हाथ हिलाते पत्ते, शर्मीली देहाती नदी और अकेलापन । इस चरम एकाकी बचपन का क्या प्रभाव हुआ उन पर यह तो उन्होंने वक्तव्य में नहीं बताया पर बालमनोविज्ञानवेत्ता इसके कई अर्थ निकाल सकते हैं । चरम एकाकी बच्चा फूल-पत्तियों, नदियों, पक्षियों से जुड़कर उनसे आत्मीयता स्थापित कर अत्यन्त करुणामय, संवेदनशील सहज स्वाभाविक भी हो सकता है, पर दूसरी ओर नितान्त एकाकी बच्चा भीड़भाड़ से डरने वाला सहज सामाजिक जीवन से अलग-थलग रहने वाला, ऊपर से तननेवाला और अन्दर से झुकने वाला, डरा हुआ, हर पत्ते के खडकने पर सचेत और सन्नद्ध होने वाला भी हो सकता है । एक तीसरी स्थिति और हो सकती है – चरम एकाकी बच्चा प्रारम्भ में सहज सामाजिक रिश्तों के अनुशासन न होने के कारण कठोर, आत्मकेन्द्रित और थोड़ा हिंसक भी हो सकता है ।

इस प्रकार अज्ञेय की प्रारंभिक शिक्षा घर पर हुई क्योंकि प्राइमरी पाठशाला के प्रति अरुचि थी । उच्च शिक्षा मद्रास और लाहौर में हुई । बचपन उन्होंने लखनऊ, काश्मीर, बिहार और मद्रास में बिताया । सन १९२९ में फार्मन कॉलेज लाहौर से बी०एस-सी परीक्षा प्रथम श्रेणी में उतीर्ण की । १९३० में अंग्रेजी से एम०ए० का अध्ययन प्रारंभ किया, किन्तु क्रांतिकारी दल में भाग लेने के कारण गिरफ्तार हुए और लगभग चार वर्षों तक बन्दी जीवन व्यतीत किया ।

सम्पादन कला में अपनी पटुता उन्होंने सैनिक (आगरा), ’बिजली"(पटना) तथा ’विशाल भारत’ (कलकत्ता) के सम्पादन में दिखायी । सन १९४० से १९४२ तक किसान आन्दोलन में रहे । सन १९४३ से ४६ तक सेना में कैप्टन रहे । फिर सन ४७ में प्रयाग से नवलेखन की सुप्रसिद्ध पत्रिका ’प्रतीक’ निकाली । सन १९५० से ५५ तक आकाशवाणी की सेवा में रहे । सन १९५५ से ६० तक क्रमशः यूरोप पूर्वी एशिया और जापान का भ्रमण करते रहे । जन्मजात विदोही कलाकार और यायावर रहे । तारसप्तक के प्रकाशन ने आपकी प्रतिष्ठा में चार चाँद लगाया । ’चिन्ता ’ में लिखा आपका वक्तव्य द्रष्टव्य है – "मैं था कलाकार सर्वतोन्मुखी निज क्षमता का अभिमानी ।" इस प्रकार उन्होंने स्वयं को यायावर भी कहा है । तारसप्तक के आत्मपरिचय में लिखते हैं –

"जन्म मार्च १९११ में एक शिविर में हुआ । उसी से आवारगी की छाप पड़ी हुई है और धाम पूछने पर प्रायः उत्तर मिलता है रेलगाड़ी में ।"

अपनी ’अरे यायावर रहेगा” याद पुस्तक में  इस यायावरी वृत्ति का और भी स्पष्टीकरण उन्होंने किया है । सच पूछिये तो जनाब राहुल सांकृत्यायन के नूतन परिवर्द्धित संस्करण ही रहे ।

जब इनके व्यक्तित्व की ओर दृष्टिपात करता हूँ तो डॉ० शान्ति स्वरूप गुप्त का कथन स्मृति में आ जाता है –

"अज्ञेय सुशिक्षित  और सुसंस्कृत व्यक्तित्व के धनी हैं…उनका मन और मस्तिष्क दोनों प्रौढ़ हैं- एक ओर संवेदनशील कवि हृदय है तो दूसरी ओर वह गम्भीर चिन्तक हैं ….. काव्य के प्रति उनका दृष्टिकोण अन्वेषी का है ….. पाश्चात्य सहित्य का व्यापक अध्ययन और मन्थन करने और आधुनिकता से निकट सम्पर्क होने पर भी अज्ञेय मूलतः भारतीय हैं ।… अज्ञेय का साहित्यिक व्यक्तित्व टी०एस०ईलियट व जॉनसन के निकट है । उनका काव्य व्यक्तित्व एक साथ वर्तमान, अतीत और भविष्य की ओर उन्मुख रहा है ।"

अज्ञेय का १९८७ में स्वर्गारोहण हिन्दी साहित्य का वह रिक्त स्थान है जिसकी पूर्ति बहुत दिनों तक असम्भव सी लग रही है । अंत में डॉ० विद्यानिवास मिश्र के शब्दों में कह सकते हैं –

"एक जिन्दादिल आदमी की तरह वे अच्छे भोजन का स्वाद जानते हैं, अच्छी रहन सहन की परख रखते हैं, पर इसके साथ ही फकीर ऐसे हैं कि फटे जूतों में बर्फीली सड़कों पर दिन में बीस-बीस मील पैदल घूम सकते हैं । संग्रह करते रहेंगे और एक दिन सब बाँट-बूँटकर निर्द्वन्द्व हो जायेंगे । गृहस्थी की हुनर भी जानते हैं, मन से अनिकेत हैं ।"

ऐसा औघड़ आदमी फागुन में ही जन्म सकता था, ’फरे फागुन बीच’ जनम लेने वाला आदमी ही जहाँ रंग-बिरंगे फूलों में सजता है, वहीं संवत की धूल में भी । वह पलाश के साथ दहकता है तो पिचकारियों के साथ भींगता भी है । वह जितना ही निर्बंध है, उतना ही आनुशासित । बसन्त उसका प्रारंभ है, प्रथम चरण है । वह ग्रीष्म के अन्धड़ झेलने वाला, दामिनी की दमक झेलने वाला, शरद की शुभ्रता में परिणित पाने वाला कलाकार है ।