अब न रह पायेगा …

अब न रह पायेगा तुम्हारे देह मन पर आदमी का वश कि जैसे वह तुम्हें रखे रहे मुख से न अपने भूल कर भी कुछ कहे जबकि करोडों आज युवकों की तरफ से कह रहा हू मैं तुम्हारा प्रभु नहीं हूँ, हाँ सखा हूँ, और तुम को सिर्फ अपने प्यार के सुकुमार बन्धन में हमेशा … पढना जारी रखे

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अज्ञेय की कविता में काम-2

’चिन्ता’ की कवितायें अज्ञेय की काव्य-उर्मि पार्थिव जगत की समग्रता को ग्रहण करती है। एक उर्जस्वित उर्जा, जीवन की सर्वाधिक महत्वपूर्ण उर्जा का स्फुलिंग ही काम है। काम शिखरारोहण करते करते प्रेम बन जाता है। ’विद्यानिवास मिश्र’ ने कहा है कि अज्ञेय के काम या प्रेम में “जीवन रस का आचमन हाथ से नहीं, होठों … पढना जारी रखे

अज्ञेय की कविता में काम-1

काम की अवधारणा एवं अज्ञेय की कविता में इसका शिल्पन अज्ञेय की कविताओं के संकलन की भूमिका में डॉ० विद्यानिवास मिश्र ने बड़ा ही स्पष्ट संकेत दिया है- “अज्ञेय की कविता के तीन चरण दिखते हैं- पहला है विद्रोह और हताशा का, दूसरा है अपने भीतर शक्ति संचय का और तीसरा है बिना किसी आशा … पढना जारी रखे

  • Prakarantar

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