आँसू : जयशंकर प्रसाद (पंक्ति-व्याख्या)

“मानव जीवन वेदी पर, परिणय हो विरह मिलन का। सुख दुख दोनों नाचेंगे, है खेल आँख और मन का ॥”  इन पंक्तियों में कवि अपने निविड़ जीवन के सुख दुखात्मक अनुभूति का चित्रण करते हुए कहता है कि जीवन  सुख और दुख की लीला भूमि है। यहाँ विरह और मिलन का परिणय हुआ करता है … पढना जारी रखे

  • Prakarantar

    इस ब्लॉग पर अकादमिक लेखों के अतिरिक्त अन्य स्थलों पर प्रकाशित व अन्यान्य अवसरों पर लिखी रचनायें प्रस्तुत होँगी। यह रचनायेँ मौलिक हैं परंतु इनके लेखन में विभिन्न साहित्यिक एवं वेब-स्रोतों से सहायता ली गयी होगी एवं कई अन्य अनजाने सहयोग भी प्राप्त हुए होंगे। सुविधानुसार व जानते हुए प्रत्येक स्थान पर उन स्रोतों का उल्लेख कर दिया गया है, परंतु भूलवश या जानकारी न होने के कारण यदि कोई स्रोत-उल्लेख रह गया तो कृपया बतायें। यह ब्लॉग सर्वाधिकार सुरक्षित है की रूढ स्पष्टता से मुक्त है। इस ब्लॉग के उल्लेख के साथ किसी भी सामग्री का रचनात्मक उपयोग इस ब्लॉग के लिए हितकारी होगा।