अज्ञेय की कविता में काम – 5

अहं और काम निःसन्देह जहाँ कवि अहं को तिरोहित हो जाने देता है वहाँ काम की बड़ी ही उत्तम अनुभूतियों में मग्न होता है। ऐसे स्थलों पर वह विरह के आघात से अपने ’प्यार को दूना’ हुआ बताता है। वह प्रेम में ’चिर ऐक्य’ का विरोधी है। ऐसे स्थलों पर वह प्रेम के वासनात्मक नहीं … पढना जारी रखे

अज्ञेय की कविता में काम-4

प्रेम की उत्पत्ति का कारण रूप है और सौन्दर्य की तीव्रानुभूति जब प्रेम को जन्म देती है तो व्यक्ति उसमें अपने आपको भूल जाता है। जब तक व्यक्ति बौद्धिक स्तर पर सचेत जीवन जीता है, आत्मस्थ नहीं होता। उसके जीवन का कोई भी क्षण पूरी तरह अपना नहीं होता परन्तु किसी विशिष्ट मुद्रा में अपने … पढना जारी रखे

  • Prakarantar

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