अज्ञेय की कविता में काम-3

प्रेमानुभूति

अज्ञेय

अज्ञेय

अज्ञेय के लिए काम अथवा प्रेम का मतलब है पल पल जीना। प्रेम का मतलब है आज मैं आपको प्रेम करता हूँ कल का क्या भरोसा? प्रेम को अज्ञेय का कवि मौत के क्षण में भी अन्वेषित और अपने हेतु उपलब्ध करता है। मृत्यु व्यक्ति की होती है, लेकिन प्रेम की आदर्श स्थिति में व्यक्तित्व होते ही नहीं, फिर मृत्यु किसकी होगी? प्रेम व्यक्ति को उसके अहं से मुक्त करता है; उसकी मर्त्य नियति से ऊपर उठाता है; इसलिए हम उतना ही जीते हैँ जितना कि प्रेम करते हैं। प्रेम आत्मदान और आत्माहुति में है इसलिए जिसने प्रेम किया वह स्वयं को समाप्त करके ही ऐसा करता है। उसे मृत्यु का स्वाद जीवन भर मिलता रहता है। उसके लिए हर बीत गया क्षण मृत्यु है और हर भोगा जाता हुआ वर्तमान क्षण जीवन है। अज्ञेय प्रेम को, काम को, अनुराग को मृत्यु के भय के प्रत्याख्यान का माध्यम बनाते हैँ। 1936 में दिल्ली के एक कवि सम्मेलन में सुनायी गयी कविता “मैं तुम्हारे ध्यान में हूँ” ऐसी ही एक कविता है –

क्यों डरूँ मैँ मृत्यु से या क्षुद्रता के शाप से भी?
क्यों डरूँ मैँ क्षीण पुण्या अवनि के संताप से भी?
व्यर्थ जिस को मापने में है विधाता की भुजायें –
वह पुरुष मैं, मर्त्य हूँ पर अमरता के मान में हूँ।
मैं तुम्हारे ध्यान में हूँ।

अज्ञेय गहनतम प्रेमानुभूति में अपने को डुबा देना चाहते हैं और उनके लिए क्षण भर की गहरी प्रेमानुभूति किसी भी अन्य बाह्य वस्तु की अपेक्षा अधिक महत्व रखती है। प्रेम सबसे बड़ी कला है। उससे बड़ा कोई ज्ञान नहीं है। प्रेम में ही अंतर्गृह में प्रवेश करते हैं। स्थिति यह है कि अपनी कविता ‘क्षण  भर सम्मोहन छा जाये’ में वे चाहते हैं कि बस एक क्षण प्रेमानुभूति का मिल जाय और चाहे उस क्षण के बाद क्रूर काल प्रलय के बादलों की वर्षा ही क्यों न कर दे, वे उसको भी सहन कर लेंगे –

एक निमिष भर बस।
फिर विधि का घन प्रलयंकर बरसा आवे,
क्रूर काल-कर का कराल शर मुझको तेर वर-सा आवे।
क्षण भर सम्मोहन छा जावे।

प्रेमानुभूति के किसी भी क्षण को वह खोना नहीं चाहता क्योंकि उसको विरह में बदलते देर नहीं लगती। मिलन में सातत्य नहीं होता परंतु उसके क्षण में तड़ित सी तीव्रता होती है –

और होगा मूर्ख जिसने चिर मिलन की आस पाली –
‘पा चुका-अपना चुका’- है कौन ऐसा भाग्यशाली?
इस तड़ित को बाँध लेना देव से मैंने न माँगा-
मूर्ख उतना हूँ नहीं इतन नहीं है भाग्य मेरा।

और यह मिलन का क्षण कितना अल्प होता है इसकी ओर ध्यान खींचते हुए कवि कहता है –

श्वांस की हैँ दो क्रियायें-खींचना, फिर छोड़ देना,
कब भला सम्भव हमें इस अनुक्रम को तोड़ देना?
श्वास की उस सन्धि सा है इस जगत में प्यार का पल
रुक सकेगा कौन कब तक बीच पथ में डाल डेरा।

इसीलिए वह इस क्षण को व्यर्थ न गंवा कर मिलन के सुख से इस क्षण को यादगार बना लेना चाहता है। इस प्रकार के भाव उनकी कविता ‘उषा के समय’ में मिलते हैं कि अभी जो हमारे मिलन के सुख के क्षण हैं कल वे प्रातं केवल एक स्वप्न बन कर रह जायेंगे, उनकी यादगार ही हमारे पास शेष बचेगी, तो क्यों न हम इस प्रणय के क्षण को पूरी तरह जी लें-

ये सब चिर-वांछित सुख अपने
बाद उषा के होंगे
सपने फिर भी इस क्षण के गौरव में हम तुम हों-अम्लान।

क्रमशः —

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