अज्ञेय की कविता में काम-2

अज्ञेय

’चिन्ता’ की कवितायें

अज्ञेय की काव्य-उर्मि पार्थिव जगत की समग्रता को ग्रहण करती है। एक उर्जस्वित उर्जा, जीवन की सर्वाधिक महत्वपूर्ण उर्जा का स्फुलिंग ही काम है। काम शिखरारोहण करते करते प्रेम बन जाता है। ’विद्यानिवास मिश्र’ ने कहा है कि अज्ञेय के काम या प्रेम में “जीवन रस का आचमन हाथ से नहीं, होठों से करने का भाव है”। अज्ञेय के ’भग्नदूत’, ’चिन्ता’ व ’इत्यलम’ की कविताएँ मिलकर काम का तानाबाना बनाती हैं । ’रामस्वरूप चतुर्वेदी’ ने अज्ञेय के काम-प्रेमोद्वेलित काव्य कृतियों को एक भटकन माना है, किन्तु लगभग तेरह वर्ष और संख्या की दृष्टि से लगभग तीन सौ कवितायें भावबोध के स्तर पर अज्ञेय की काव्ययात्रा के महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं। ये कामानुभूति-सौन्दर्यानुभूति की प्रेरक रचनायें शेखर की बात याद दिलाती हैं –

“और तब दीखता है कि मेरी भटकन में भी एक प्रेरणा थी जिसमें अन्तिम विजय का अंकुर था, मेरे अनुभव वैचित्र्य में भी एक विशेष रस की उपभोगेच्छा थी जो मेरा निर्देश कर रही थी।”

’चिन्ता’ की कवितायें जीवन्त आवेग की सच्चाई को, अनुभव के तथ्यों को पकड़ती हैं। कुछ कवितायें ’प्रसाद’ के प्रभाव को स्पर्श करती हैं और अनुभूति में दर्शन को घुला देने की राह दिखा रही हैं। प्रसाद की बिम्ब योजना-

“तुम हो कौन और मैं क्या हूँ
इसमें क्या है धरा, सुनो
मानस जलधि रहे चिर-चुम्बित
मेरे क्षितिज उदार बनो।”

इनका सम्बन्ध ’चिन्ता’ की तीसरी कविता की इन पंक्तियों से जुड़ता है-

“परिचय परिणय के बन्धन से
भी घेरूँ मैं तुमको क्यों?
सृष्टि मात्र के वांछनीय सुख!
मेरे भर हो जाओ क्यों?”

’चिन्ता’ की भूमिका में अज्ञेय का कथन है- “पुस्तक के दो खण्डों में क्रमशः पुरुष और स्त्री के दृष्टिकोण से मानवीय प्रेम के उद्भव, उत्थान, विकास, अन्तर्द्वन्द्व, ह्रास, अन्तर्मन्थन, पुनरुत्थान और चरम सन्तुलन की कहानी कहने का यत्न किया गया है। कहानी वर्ण्य विषय की भाँति अनगढ़ है और जैसे प्रेम-जीवन के प्रसंग गद्यपद्यमय होते हैं वैसे ही यह कहानी भी गद्यपद्यमय है।”

चिन्ता का फलक नारी और पुरुष के सम्बन्धों का प्रतिफलन है। पुरुष ने जीवन भर स्त्री को एक सुन्दर पत्थर ही समझा और अन्त में उसे ज्ञात हुआ कि वह एक प्रज्ज्वलित हृदय है-

“तब मैने उसके ताप में ही अपनी
प्रस्तर प्रतिमा गला डाली और एक नयी
प्रतिमा का निर्माण किया और यह नयी प्रतिमा
थी एक स्त्री, मेरी प्रेयसी, विश्वप्रिया।”

लोचनयुत होकर भी उनको हम प्रज्ञाचक्षु ही कहेंगे जो अज्ञेय की उद्दाम प्रेमाभिलाषा पर मुँह विचकाते हैं और अज्ञेय की प्रच्छन्न ही सही किन्तु अन्त तक बनी आन्तरिक प्रणय की लय, आन्तरिक तड़प, एकान्त सन्नाटे का विरह और गर्व तथा आकर्षण की ओर पीठ करके बैठ जाते हैं। चिरन्तन पुरुष अज्ञेय के मन्तव्यों का प्रवक्ता बनकर कहता है- “प्रेम में बन्धन नहीं है। जो प्रिय वस्तु को स्वायत्त करने की इच्छा होती है -वह इच्छा जिसे हम प्रेम का आकर्षण कहते हैं -वह केवल हमारी समाजिक अधोगति का एक गुबार है।” महादेवी जी के काव्यगत ’प्रियतम’ को तम के परदे में आना भाता है और ’अज्ञेय’ ने यही दशा एक प्रियतमा की बताई है जो सभी कार्य गुप्त रीति से करके अन्तर्धान हो जाती है –

“छिपे आई हो मन्दिर द्वार
छिपे ही भीतर किया प्रवेश
*    *   *    *   *    *     *       *
तुम्हें अनदेखे देकर भेंट
तिमिर में हूँगी अन्तर्धान।”

चिन्ता के प्रणयी पुरुष ने प्रेम के सम्बन्ध में यह वक्तव्य दिया है – “दीपक के जीवन में कई ऐसे क्षण आते हैं जब वह अकारण ही, या किसी अदृश्य कारण से एकाएक अधिक दीप्त हो उठता है, पर वह सदा उसी प्रोज्ज्वलतर दीप्ति से नहीं जल सकता। प्रेम के जीवन में भी कई ऐसे क्षण आते हैं जब अकस्मात ही उसका आकर्षण दुर्निवार हो उठता है, पर वह सदा उसी खिंचाव को सहन नहीं कर सकता। फिर प्रियतम! हम क्यों कहते हैं सदा इस उर्ध्वगामी ज्वाला की उच्चतम शिखा पर आरूढ़ होना।” अद्भुत है अज्ञेय का काम-प्रेम आह्वान!

“आ जाना प्रिय आ जाना!
अपनी एक हँसी में मेरे आँसू लाख डुबा जाना।
हा! हृतन्त्री का तार तार, पीड़ा से झंकृत बार बार
कोमल निज नीहार-स्पर्श से उसकी तड़प सुला जाना।
फैला वन में घन अन्धकार, भूला मैं जाता पथ प्रकार –
जीवन के उलझे बीहड़ में दीपक एक जला जाना ।
सुख-दिन में होगी लोकलाज, निशि में अवगुंठन कौन काज?
मेरी पीड़ा के घूँघट में अपना रूप दिखा जाना।
दिनकर-ज्वाला को दूँ प्रतीति? जग-जग, जल-जल काटी निशीथ
ऊषा से पहले ही आकर जीवन दीप बुझा जाना।
प्रिय आ जाना।”

—-क्रमश:

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