चरित्र : दूसरों को जिंदा रखने का प्रयत्न

हिन्दी कहानी में मानवीयता से संपृक्त लेखन के लिये उल्लेखनीय कथाकारों में एक अग्रणी नाम है ’श्री द्विजेन्द्र नाथ मिश्र निर्गुण’ । निर्गुण जी ने हिन्दी कहानी को एक विशिष्ट भाव-प्रवणता और सम्मोहक अनुभूति का गौरव दिया है । सारिका के १६-३१ अक्टूबर के अंक में प्रकाशित ’निर्गुण’ जी के  महत्वपूर्ण साक्षात्कार (कमल गुप्त/पुष्पा अवस्थी द्वारा लिया गया) का अंश आपके सम्मुख प्रस्तुत है । इससे निर्गुण के व्यक्तित्व और चरित्र का सहज परिचय प्राप्त होता है –

कमल गुप्त/पुष्पा अवस्थी – मैं यह पूछना चाहूँगा कि आज के इस हिन्दी लेखन को आप और क्या देना चाहेंगे संदेश के रूप में । एक विचार के रूप में…

’निर्गुण ’- रचनायें जो आज लिखी जा रही हैं उनमें स्वच्छता बहुत जरूरी है । और यह स्वच्छता, मन की बहुत जरूरी है । आदमी का मन गंदा हो गया है , यह गंदगी किसी तरह से हटनी चाहिये । जिस तरह से संभव हो सके गंदगी हटाये जान के हर संभव उपाय करने चाहिये । लेखक को चारित्रिक पतन से बचाया जाये । लेखक को स्वयं इससे उबरना चाहिये । यह कैसे होगा , देखिये , यह तो मैं नहीं बतला सकता , क्योंकि मेरा दृष्टिकोण यह है कि इससे व्यक्तिगत स्तर की बात आ जाती है । मैं अपने को उबार लूँ । मैं कोई गलती खुद न करूँ । मैं इतना कर सकता हूँ और लेखक इतना ही कर सकता है । अब देखिये, आप हमारे मित्र हैं , मैं आपको तो नहीं संभाल सकता । बदल सकता । पर खुद को संभाल सकता हूँ , गलत रास्ते पर जाने से खुद को रोक सकता हूँ । हम अपने चरित्र को सुधारे रहें, और इसका मतलब रिफ्लेक्शन साहित्य में जरूर होगा ।

कमल गुप्त/पुष्पा अवस्थी – निर्गुण जी, गलत और सही को परिभाषित करना फिलहाल बड़ा कठिन है । ’चरित्र’ बड़ा वेग शब्द है । हमेशा इस्तेमाल कर लिया जाता है । चरित्र बड़ा ही अपरिभाषित शब्द है जिससे अनेक तरह की व्यंजनायें निकलती हैं । आप निश्चित रूप से चरित्र को किस अर्थ में आज के लेखन में स्थापित करना चाहेंगे ?

’निर्गुण’ – आपने बड़ा अच्छा सवाल किया है । चरित्र का अर्थ सिर्फ वही नहीं है जो लोग लगाते हैं । वह बहुत सीमित है और एक कतरा है । चरित्र एक पूरी दिनचर्या और व्यक्तित्व है । सुबह उठने से लेकर रात सोने तक की सारी दिनचर्या चरित्र से संबंधित है । … कैसे हम जीते हैं, निकट के संपर्कों में आपसी रिश्तों को…?

कमल गुप्त/पुष्पा अवस्थी – जीते ही हैं सिर्फ या दूसरों को जिंदा भी रखते हैं ..

’निर्गुण’ – हाँ, दूसरों को जिंदा रखने का प्रयत्न करना चरित्र है । ऋग्वेद का एक मंत्र है, ऋषि ने कहा है कि रात को सोते समय यह याद करना चाहिये कि सारे दिन तुमने क्या अच्छा काम किया । तुमने किसी को क्या दिया । किसको देने की प्रेरणा दी । कितना सुंदर कथन है … अगर व्यक्ति की दिनचर्या में यह आ जाता है तो उसका चरित्र बन जाता है ।

……….

मेरे अन्य चिट्टों की प्रविष्टियाँ –

# तेहिं तर ठाढ़ि हिरनियाँ … (सच्चा शरणम )

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Comments
One Response to “चरित्र : दूसरों को जिंदा रखने का प्रयत्न”
  1. padmsingh कहते हैं:

    हाँ, दूसरों को जिंदा रखने का प्रयत्न करना चरित्र है । ऋग्वेद का एक मंत्र है, ऋषि ने कहा है कि रात को सोते समय यह याद करना चाहिये कि सारे दिन तुमने क्या अच्छा काम किया । तुमने किसी को क्या दिया । किसको देने की प्रेरणा दी । कितना सुंदर कथन है … अगर व्यक्ति की दिनचर्या में यह आ जाता है तो उसका चरित्र बन जाता है ।
    …..कितनी सारमय और सार्थक बातें ….
    बहुत आभार

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