भूमिका-४ (लघु शोध प्रबंध)

· लघुशोध प्रबंध
Authors

वह युग-परिवेश जिसमें अज्ञेय का परम्परा और प्रयोग से कन्धे से कन्धा मिलाकर चलना हुआ है, वह प्रगतिवादी और प्रयोगवादी दोनों का विरल सन्तुलन है । प्रगतिवादियो कवियों का उपास्य कार्ल मार्क्स है तो प्रयोगवादी कवियों का ईष्ट फ्रॉयड है । एक में ’कला जीवन के लिये है’ तो दूसरे में ’कला कला के लिये का विधान है । अज्ञेय जी ने अपनी कविता ’मैं वहाँ हूँ ’ में सबको अपनी काव्य-भूमि पर एकत्र कर लिया है । कोई ऊँच-नीच क्षुद्र-महान, जघन्य-पुण्यवान का भेद-भाव नहीं है । सभी एक रंग में रंगे हैं । देश और काल का भी कोई ध्यान नहीं है । मानव जो भी है , जहाँ भी है कवि की काव्य-सामग्री का उपकरण बन कर आ सकता है । किसी को भी कवि के गृह-द्वार से निराश होकर लौटने की आवश्यकता नहीं है । मानवीय़ सम्बंधों के नये क्षेत्रों का उद्घाटन हो रहा है । तुच्छातितुच्छ वस्तुओं को ग्रहण किया जा रहा है और अदृष्टपूर्व वातायनों के अजाने कपाट एक झटके से खोले जा रहे हैं । ऐसी-ऐसी उपेक्षित वस्तुओं की ओर ध्यान आकृष्ट किया और कराया जा रहा है जिन पर शताब्दियों से धूल की परतें जमी थीं , उन भस्मीभूत परतों के नीचे ’सत्य’ रूपी अंगार को उकेरा जा रहा है ।

अज्ञेय

अज्ञेय

अज्ञेय ने अपने काव्य में जिसकी चर्चा सुविधानुसार होगी , सब कुछ काव्य की परिधि में अन्तर्भूत करने का सुझाव दिया है । ’प्रतीक’ के एक सम्पादकीय़ में उन्होंने स्वीकार किया है कि हम विशुद्ध साहित्यिक विषयों से आगे बढ़कर साहित्य के भौतिक, दार्शनिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक आदि परिपार्श्वों से सम्बंध रखने वाली सामग्री भी प्राप्त करेंगे और इनसे तथा लौकिक जीवन से मिलने वाली प्रेरणाओं का अभिनन्दन भी करेंगे ।

इस प्रकार अज्ञेय के काव्य का विवेचन हम एक यौगिक और तात्विक दृष्टि से ओतप्रोत काम, ध्यान और अध्यात्म की पृ्ष्ठभूमि में करने का प्रयास करेंगे और यह देखना चाहेंगे  कि कैसे काम परिवर्तित और परिवर्धित होकर प्रेम की परिधि को स्नात करता हुआ ध्यान  की भूमिका   ग्रहण करता है और अध्यात्म की चेतना का चरम शिखर छू लेता है । अज्ञेय  के काव्य में काम, ध्यान और अध्यात्म का त्रिभुज कैसे निर्मित हुआ है और उनकी रचनायें कैसे पंचक्रोशी यात्रा पार करती हैं – अन्नमय कोश से आनन्दमय कोश तक की परिणिति अज्ञेय  में कैसे फलित होती है – आगे इसका ही विवेचन करने का प्रयास होगा ।

विवे्चना के क्रम में कवि के १५ काव्य-ग्रंथों को मैंने अपने  वि्वेच्य विषय के तीन श्रेणियों में विनिवेशित  किया है । कवि की रचनायें ’भग्नदूत’ (१९३३), चिन्ता(१९४२), इत्यलम(१९४६), हरी घास पर क्षण भर’ (१९४९) और बावरा अहेरी (१९५४) – इन पाँच रचनाओं को मैंने काम के अन्तर्गत रखा है । ’इन्द्रधनु रौंदे हुए ये ’ (१९५७), ’अरी ओ करुणा प्रभामय (१९५९), ’आँगन के पार द्वार’ (१९६१), कितनी नावों में कितनी बार  (१९६७) और क्योंकि मैं उसे जानता हूँ (१९६९) – इसे ध्यान के व्यापक क्षेत्र में मैंने ग्रहण किया है । कवि की मनीषा का अदभुत नवनीत उसके जीवन के उत्तर काल की पाँच रचनाओं में अभिव्यक्त हुआ है । इन्हें मैंने कवि का अध्यात्म क्षेत्र माना है । ये हैं – सागर मुद्रा (१९७१), पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ (१९७४), महावृक्ष के नीचे (१९७७), नदी की बाँक पर छाया (१९८२) और ऐसा कोई घर आपने देखा है  (१९८६) ।

कवि की काव्य-चेतना का पाथेय बड़ा ही क्लिष्ट है , विशिष्ट है और सच पूछॆं तो क्लिष्ट भी है । इसके कामादिक तीनों आयामों की पृथक विवेचना के पूर्व बता दूँ मैंने यह भी अन्वेषित करने का प्रयास किया है कि कवि की कविता ’spirituality’ का एक अनबूझ आयाम है जिसमें सप्त-चक्रों की खोज जैसा प्रयास है ।

मूलाधार चक्र कवि की भग्नदूत , चिन्ता और इत्यलम हैं । स्वाधिष्टान चक्र ’हरी घास पर क्षण भर’ बावरा अहेरी और इन्द्रधनु रौंदे हुए ये हैं । मणिपूर चक्र में ’अरी ओ करुणा प्रभामय’, आँगन के पार द्वार’ कितनी नावों में कितनी बार है । ’क्योंकि मैं उसे जानता हूँ – यह अज्ञेय की अनाहत चक्र की उपलब्धि है । सागर मुद्रा, उनका विशुद्ध चक्र है । आज्ञा चक्र की विरल उपलद्भियों में पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ, महावृक्ष के नीचे और नदी की बाँक पर छाया है , और उनक महत्तम आयास – सहस्रार चक्र की उपलब्धि जैसा की नाम से ही स्पष्ट है -वह  है ’ऐसा कोई घर आपने देखा है “।

आगे इसी परिप्रेक्ष्य में कवि की काव्य-चेतना का काम ध्यान और अध्यात्म का अनुशीलन प्रस्तुत करने का प्रयास होगा ।

1 टिप्पणी

Comments RSS
  1. MANIK

    bahut saarthak lekhan

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Connecting to %s

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.

Join 367 other followers