भूमिका-३ (लघु शोध-प्रबंध)

स०ही०वा०’अज्ञेय’
अज्ञेय की काव्ययात्रा नयी कविता की यात्रा है । इससे निर्मित मार्ग कितने ही चरणों से चुम्बित और स्पर्शित होकर आगे बढ़ता गया है । कितने ही नये कवि इसकी सही पहचान कर सके और कितने ही इस पर चलकर अब झुठला रहे हैं । कविता में अज्ञेय ने जो मानदंड अपनाया है, जो लीक पकड़ी है वह अज्ञेय लगती हो पर अप्रिय नहीं लगती । कवि का व्यक्तित्व झाँक लेने के बाद लगे हाथ यह मन होता ही है कि उसके कृतित्व का भी विहंगावलोकन कर लें ।
हिन्दी काव्य की विजयिनी कीर्ति-वसुंधरा का अज्ञेय नामधारी कवि ऐसा दूत है-’भग्नदूत’, जो अपनी ’चिन्ता’ को ’इत्यलम’ कहकर विरम नहीं गया, बल्कि ’हरी घास पर क्षण भर ’ बैठकर वह ’बावरा अहेरी’ कलेजा दबाये एकटक देखता रहा – पड़े हैं सामने ’इन्द्रधनु रौंदे हुए ये’ । उठे उसके सजल नेत्र ऊपर । कभीं आँखें पसारकर, कभीं आँखें बंदकर फूट पड़ा वह अस्तित्व-सर्जन के आगे – ’अरी ओ करुणा प्रभामय !’ ’आँगन के पार द्वार’ का संधान करा दे । वह ’कितनी नावों में कितनी बार’ बैठकर आता है । ’सागर-मुद्रा’ में ’महावृक्ष के नीचे’ बैठकर उद्घोषणा करता है – ’पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ’ क्योंकि मैं जानता हूँ कि किसी ने ’ऐसा कोई घर देखा है ’।
कवि ’विश्वप्रिया ’ के पाँवों पड़ा, ’सांध्यतारा’ से, प्रातः रवि से, अस्तंगत सविता से, उछलती मछली से, लहरती झील से, अंतःसलिला सरिता से, उमड़ती सागर बेला से, बासन्ती झुरमुट से, बाजरे की कलगी से, आँगन के द्वार से, द्वारहीन द्वार से, रूप अरूप से, चक्रान्त शिला से, असाध्य-वीणा से – किससे, किससे नाता नहीं जोड़ता है, कहाँ-कहाँ नहीं रोता है, निज को कहाँ-कहाँ नहीं खोता है, और जो चिन्तन प्रसूत रत्न संग्रह करता है प्रेम से उसे लुटा देता है । अज्ञेय की काव्य-यात्रा को इस तरह अपनी रचनाओं में निम्न पड़ाव देखने पड़े हैं -
- चिन्ता (१९४२)
- इत्यलम (१९४६)
- हरी घास पर क्षणभर (१९४९)
- बावरा अहेरी (१९५५)
- इन्द्रधनु रौंदे हुए ये (१९५७)
- अरी ओ करुणा प्रभामय ! (१९५९)
- आँगन के पार द्वार (१९६१)
- कितनी नावों में कितनी बार (१९६७)
- क्योंकि मैं उसे जानता हूँ (१९६९)
- सागर मुद्रा (१९७०)
- पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ (१९७४)
- महावृक्ष के नीचे (१९७७)
- नदी की बाँक पर छाया (१९८१)
- ऐसा कोई घर देखा है (१९८६)
इस प्रकार उनका काव्य सब प्रकार की विरोधी और साम्य युक्तियाँ लेकर चला है और सब उनमें सहज ही आ गये हैं क्योंकि वे अज्ञेय जो हैं । उनके कृतित्व-व्यक्तित्व को विराम दे रहा हूँ डॉ० विद्यानिवास मिश्र के शब्दों के साथ -
“अन्तःस्मित अन्तःसंयत हरी घास की तरह नमना, ’खुल-खिलना’, ’सहज मिलना’ , एक साथ इतिहास, अपने चेहरे, परम्परा, मुकुट, बालकों के भवितव्य के भोले विश्वास के प्रति उत्तरदायित्व अपने ऊपर ओढ़ लेना, ’इयत्ता की तड़प के साथ उछली हुई मछली को सागर के सन्दर्भ में आँकना’ ’सीमाहीण खुलेपन’ के लिये प्रयत्न करते हुए भी ’विशाल में बह न सकने’ की असमर्थता का ज्ञान, शब्द को ’नैवेद्य’ मान कर बाँटते हुए भी ’मौन की अभिव्यंजना’ मानना, ’जीवन की धज्जियाँ उड़ाकर भी ’ जीवन के लिये पने को निरन्तर उत्सर्ग करते रहना, आशा के बिना भी निरांतक रह सकना – ये गुण अज्ञेय में आकस्मिक नहीं हैं ।”
जारी …..



क्या बात है भाई अज्ञेय जी का जिक्र करके अनुग्रहीत कर दिया। कैसे लोग थे जो अब नही होते
Krishna Kumar Mishra
दिसम्बर 13, 2009 at 7:56 अपराह्न
कृष्ण कुमार जी,
टिप्पणी का आभार । स्नेह बनाये रखें ।
हिमांशु
दिसम्बर 15, 2009 at 6:55 पूर्वाह्न
हिमांशु जी नमस्कार !
पहली बार खोजते हुए आपके ब्लॉग पर पहुंचा हूँ …. अभिभूत हूँ आपकी क्षमताओं का विस्तार देख … आप जैसे ब्लोगर ही ब्लॉग जगत के हीरे हैं जो मात्रा में तो कम पाए जाते हैं पर अपना मूल्य लाखों में रखते हैं …
मैंने देखा है कि इस प्रकार के ज्ञानमय पोस्टों और ब्लोग्स पर लोग रुकना भी पसंद नहीं करते हैं …जब कि उन पर भीड़ दिखेगी जो शब्दों को तोड़ मरोड़ कर और मदारी जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं और डुगडुगी के सहारे टिप्पणी पाने की अपेक्षा रखते हैं …….
आपके लेखन से आपकी गहराई और ऊंचाई दोनों का आभास मिल गया है
……… बहुत आभार आपका
padmsingh
फ़रवरी 23, 2010 at 9:56 अपराह्न