भूमिका-२ (लघु शोध प्रबंध)
’धर्मवीर भारती’ ’कुछ चेहरे कुछ चिन्तन’ में सन्नाटे का छन्द नामक फिल्म का उद्धरण देते हुए कहते हैं –
"एक समुद्र है । कहाँ का है, कुछ पता नहीं चलता । पुरी का समुद्र होता तो विराट सर्पाकार लहरें उमड़-उमड़कर इस तरह लपकतीं मानो सारी पृथ्वी को निगल जायेंगी, बम्बई का समुद्र होता तो लहरें जरा घूम कर आतीं, तट का कूड़ा-कर्कट, तिनके, कागज, पत्ते बटोर कर ले जातीं और छोड़ जातीं कुछ सीपियाँ, कुछ घोंघे, कुछ मछलियों के पंख; कोवालम का समुद्र होता तो दूर तक फैली रेत को किनारे-किनारे से छूता, सहमता, बीच के रेतीले द्वीपों में शर्माया सा खड़ा रहता – पर यह तो पता नहीं कहाँ का समुद्र है, दायें बायें चट्टानें हैं – लम्बी, पतली पत्थर की शहतीरों जैसी, जिनमें गहरा नीला सागर जल फँसा हुआ । उस जल में ज्वार की उत्ताल तरंग नहीं, लहरीली हलचल मात्र है, जो कहीं जाती नहीं, कहीं से आती नहीं बस अपनी ही जगह पर जड़ी हुई, गतिशील नहीं, केवल स्पन्दनशील है । लेकिन जो सागर ध्वनि सुनायी पड़ती है वह शिलाओं से घनघोर टक्कर लेते तूफानी समुद्र की है । मानों शिलाओं के नीचे भूकम्प की गड़गड़ाहट हो, ऊपर समुद्र की दहाड़ । उस उच्छॄंखल बड़बोले शोर को दबाटि हुई एक सौम्य, सुस्पष्ट और सधी हुई आवाज और फिर आकृति उभरती है – अज्ञेय की । वे पढ़ रहे हैं अपनी कविता – "मैं एक तनी हुई रस्सी पर नाचता हूँ ।"
भारती जी आगे लिखते हैं – "इस चित्र में अज्ञेय स्वयं अपने बारे में कुछ बातें करते हैं । कुछ व्याख्यायें, कुछ संस्मरणात्मक आत्मकथ्य, कुछ प्रतिवाद, कुछ स्पष्टीकरण ……. अपने वक्तव्य में अज्ञेय बताते हैं कि सबसे पहली और महत्वपूर्ण चीज जो उनके साथ घटी, वह थी उनके नितान्त अकेले बचपन की अनुभूति । वे कई भाई बहन थे । उनके पिता श्री हीरानन्द शास्त्री प्रख्यात पुरातत्त्ववेत्ता थे और अक्सर वे कैम्प डालकर खुदाई जहाँ चल रही हो ऐसे निर्जन स्थानों में रहते थे । सच्चिदानन्द को पिता के साथ यात्राओं पर जाने का शौक था । उन निर्जन स्थानॊ पर खुदे हुए टीलों के पास पहाड़ी की ढलान पर, नदी के किनारे घण्टों चुपचाप बैठा रहता था यह बच्चा । आसपास न कोई आदमी न कोई आदमजाद । सिर्फ सन्नाटा बुनती हवा, हाथ हिलाते पत्ते, शर्मीली देहाती नदी और अकेलापन । इस चरम एकाकी बचपन का क्या प्रभाव हुआ उन पर यह तो उन्होंने वक्तव्य में नहीं बताया पर बालमनोविज्ञानवेत्ता इसके कई अर्थ निकाल सकते हैं । चरम एकाकी बच्चा फूल-पत्तियों, नदियों, पक्षियों से जुड़कर उनसे आत्मीयता स्थापित कर अत्यन्त करुणामय, संवेदनशील सहज स्वाभाविक भी हो सकता है, पर दूसरी ओर नितान्त एकाकी बच्चा भीड़भाड़ से डरने वाला सहज सामाजिक जीवन से अलग-थलग रहने वाला, ऊपर से तननेवाला और अन्दर से झुकने वाला, डरा हुआ, हर पत्ते के खडकने पर सचेत और सन्नद्ध होने वाला भी हो सकता है । एक तीसरी स्थिति और हो सकती है – चरम एकाकी बच्चा प्रारम्भ में सहज सामाजिक रिश्तों के अनुशासन न होने के कारण कठोर, आत्मकेन्द्रित और थोड़ा हिंसक भी हो सकता है ।
इस प्रकार अज्ञेय की प्रारंभिक शिक्षा घर पर हुई क्योंकि प्राइमरी पाठशाला के प्रति अरुचि थी । उच्च शिक्षा मद्रास और लाहौर में हुई । बचपन उन्होंने लखनऊ, काश्मीर, बिहार और मद्रास में बिताया । सन १९२९ में फार्मन कॉलेज लाहौर से बी०एस-सी परीक्षा प्रथम श्रेणी में उतीर्ण की । १९३० में अंग्रेजी से एम०ए० का अध्ययन प्रारंभ किया, किन्तु क्रांतिकारी दल में भाग लेने के कारण गिरफ्तार हुए और लगभग चार वर्षों तक बन्दी जीवन व्यतीत किया ।
सम्पादन कला में अपनी पटुता उन्होंने सैनिक (आगरा), ’बिजली"(पटना) तथा ’विशाल भारत’ (कलकत्ता) के सम्पादन में दिखायी । सन १९४० से १९४२ तक किसान आन्दोलन में रहे । सन १९४३ से ४६ तक सेना में कैप्टन रहे । फिर सन ४७ में प्रयाग से नवलेखन की सुप्रसिद्ध पत्रिका ’प्रतीक’ निकाली । सन १९५० से ५५ तक आकाशवाणी की सेवा में रहे । सन १९५५ से ६० तक क्रमशः यूरोप पूर्वी एशिया और जापान का भ्रमण करते रहे । जन्मजात विदोही कलाकार और यायावर रहे । तारसप्तक के प्रकाशन ने आपकी प्रतिष्ठा में चार चाँद लगाया । ’चिन्ता ’ में लिखा आपका वक्तव्य द्रष्टव्य है – "मैं था कलाकार सर्वतोन्मुखी निज क्षमता का अभिमानी ।" इस प्रकार उन्होंने स्वयं को यायावर भी कहा है । तारसप्तक के आत्मपरिचय में लिखते हैं –
"जन्म मार्च १९११ में एक शिविर में हुआ । उसी से आवारगी की छाप पड़ी हुई है और धाम पूछने पर प्रायः उत्तर मिलता है रेलगाड़ी में ।"
अपनी ’अरे यायावर रहेगा” याद पुस्तक में इस यायावरी वृत्ति का और भी स्पष्टीकरण उन्होंने किया है । सच पूछिये तो जनाब राहुल सांकृत्यायन के नूतन परिवर्द्धित संस्करण ही रहे ।
जब इनके व्यक्तित्व की ओर दृष्टिपात करता हूँ तो डॉ० शान्ति स्वरूप गुप्त का कथन स्मृति में आ जाता है –
"अज्ञेय सुशिक्षित और सुसंस्कृत व्यक्तित्व के धनी हैं…उनका मन और मस्तिष्क दोनों प्रौढ़ हैं- एक ओर संवेदनशील कवि हृदय है तो दूसरी ओर वह गम्भीर चिन्तक हैं ….. काव्य के प्रति उनका दृष्टिकोण अन्वेषी का है ….. पाश्चात्य सहित्य का व्यापक अध्ययन और मन्थन करने और आधुनिकता से निकट सम्पर्क होने पर भी अज्ञेय मूलतः भारतीय हैं ।… अज्ञेय का साहित्यिक व्यक्तित्व टी०एस०ईलियट व जॉनसन के निकट है । उनका काव्य व्यक्तित्व एक साथ वर्तमान, अतीत और भविष्य की ओर उन्मुख रहा है ।"
अज्ञेय का १९८७ में स्वर्गारोहण हिन्दी साहित्य का वह रिक्त स्थान है जिसकी पूर्ति बहुत दिनों तक असम्भव सी लग रही है । अंत में डॉ० विद्यानिवास मिश्र के शब्दों में कह सकते हैं –
"एक जिन्दादिल आदमी की तरह वे अच्छे भोजन का स्वाद जानते हैं, अच्छी रहन सहन की परख रखते हैं, पर इसके साथ ही फकीर ऐसे हैं कि फटे जूतों में बर्फीली सड़कों पर दिन में बीस-बीस मील पैदल घूम सकते हैं । संग्रह करते रहेंगे और एक दिन सब बाँट-बूँटकर निर्द्वन्द्व हो जायेंगे । गृहस्थी की हुनर भी जानते हैं, मन से अनिकेत हैं ।"
ऐसा औघड़ आदमी फागुन में ही जन्म सकता था, ’फरे फागुन बीच’ जनम लेने वाला आदमी ही जहाँ रंग-बिरंगे फूलों में सजता है, वहीं संवत की धूल में भी । वह पलाश के साथ दहकता है तो पिचकारियों के साथ भींगता भी है । वह जितना ही निर्बंध है, उतना ही आनुशासित । बसन्त उसका प्रारंभ है, प्रथम चरण है । वह ग्रीष्म के अन्धड़ झेलने वाला, दामिनी की दमक झेलने वाला, शरद की शुभ्रता में परिणित पाने वाला कलाकार है ।



अब तो आपको पढ़ने की अभिलाषा और उत्कट होती जा रही है
मै ब्लॉग स्पोट के कोई ब्लॉग नहीं पढ़ पाता हूँ क्योंकि मै एयरसेल का नेट इस्तेमाल करता हूँ……. आपसे अनुरोध है कि आप posterous.com पर ब्लॉग रजिस्टर कर लें फिर आप को कोई पोस्ट डालने के लिए केवल एक ई मेल करना होगा बस ….. अपने आप आप आपके पुराने ब्लॉग और posterous.com दोनों पर आपकी पोस्ट एक साथ छप जायेगी. मै भी पढ़ लूँगा
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padmsingh
फ़रवरी 23, 2010 at 10:12 अपराह्न
पद्म जी,
आपकी उपस्थिति से आश्वस्त हुआ ! पोस्टरस पर मेरा अकाउंट है, यद्यपि कम लिखता हूँ उस पर ! आपके पोस्टरस ब्लॉग पर कमेंट मैं उसी अकाउंट से करता हूँ ।
वर्डप्रेस पर भी ब्लॉग बनाकर रखा है मैंने ! ब्लॉगस्पॉट के अपने ब्लॉग ’सच्चा शरणम’ का बैकअप मैं वर्डप्रेस पर लेकर रखता हूँ । आप मेरे ब्लॉगस्पॉट वाले ब्लॉग की प्रविष्टियाँ http://madhuhas.wordpress.com पर पढ़ सकते हैं । सच्चा शरणम की सारी पोस्ट्स इसी ब्लॉग पर इम्पोर्ट कर देता हूँ ।
स्नेह बनाये रखिये !
Himanshu Pandey
फ़रवरी 23, 2010 at 10:21 अपराह्न
पद्म जी, आपकी उपस्थिति से आश्वस्त हुआ ! पोस्टरस पर मेरा अकाउंट है, यद्यपि कम लिखता हूँ उस पर ! आपके पोस्टरस ब्लॉग पर कमेंट मैं उसी अकाउंट से करता हूँ । वर्डप्रेस पर भी ब्लॉग बनाकर रखा है मैंने ! ब्लॉगस्पॉट के अपने ब्लॉग ’सच्चा शरणम’ का बैकअप मैं वर्डप्रेस पर लेकर रखता हूँ । आप मेरे ब्लॉगस्पॉट वाले ब्लॉग की प्रविष्टियाँ http://madhuhas.wordpress.com पर पढ़ सकते हैं । सच्चा शरणम की सारी पोस्ट्स इसी ब्लॉग पर इम्पोर्ट कर देता हूँ । स्नेह बनाये रखिये ! हिमांशु पाण्डेय
Himanshu Pandey
फ़रवरी 23, 2010 at 10:26 अपराह्न