भूमिका (लघु शोध-प्रबंध)
अज्ञेय का काव्य किस विधा से प्राणवान हुआ है, यह मौन, सन्नाटा बुनने वाला कवि किस तरह काव्य में मुखर हुआ है, इसकी गम्भीर विवेचना के पूर्व कवि का संक्षिप्त व्यक्तित्व एवं कृतित्व आलोड़न में लेना समीचीन ही नहीं, आवश्यक भी है । डॉ० विद्यानिवास मिश्र ने लिखा है -
“हिन्दी कविता के इतिहास में अज्ञेय का नाम इस प्रकार दुर्निवार बन गया है कि जो लोग इस नाम को निकालना भी चाहते हैं, वे भी इस नाम को भूल नहीं पाते ।”
बहुमुखी प्रतिभा का कलाकार, छायावादोत्तर काल की हिन्दी कविता का सुमेरु पुरुष, प्रयोगवाद का प्रवर्तक तथा नवीन काव्य चेतना का सूत्रधार ’अज्ञेय’ नामधारी कवि अक्षय कीर्ति का अधिकारी है । अपनी विलक्षण प्रतिभा द्वारा हिन्दी कविता में आमूल क्रान्ति उपस्थित करने वाले कवि अज्ञेय की व्यक्तिगत जीवनी अनिवार्यतः ज्ञातव्य नहीं, किन्तु मूल्यवान अवश्य है । इसका मूल्य उस समय है जब वह कवि के व्यक्तित्व की मूलभूत प्रेरणाओं को प्रकाश में लाये । वैसे अन्ततः कवि के व्यक्तित्व का उत्तम परिचायक स्वयं उसका काव्य होता है । क्योंकि वही उसका श्रेष्ठ कर्म है । उसकी चरम उपलब्धि और अभिव्यक्ति है ।
इनके आविर्भाव को चित्रित करते हुए डॉ० विद्यानिवास मिश्र कहते हैं -
“आज फागुन सुदी सप्तमी है । भाई (सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय) का जन्मदिन है । आज के दिन खंडहरों में खुदाई के लिये लगे शिविर में १९११ (सात मार्च) में कुशीनगर के शालवन में उनका जन्म हुआ । बचपन में उन्हें ’सच्चा’ कहा जाता था । जेल में उन्हें उनके साथियों ने ’हाथी भाई’ कहना शुरु किया । बाद में उसी का संक्षिप्त रूप भाई शेष रह गया । इनके पिता ’पं० हीरानन्द शास्त्री पुरातत्त्ववेत्ता थे । उनके साथ जीवन का अधिकांश देशाटन में व्यतीत हुआ । पिता के साथ संस्कृत साहित्य और भारतीय कलाओं का अध्ययन उन्हॊंने किया । अपनी मुख्य अभिरुचि साहित्य बताते हुए अपने विषय में उन्होंने लिखा है -
“साहित्य के साथ बमबाजी और विषैले रसायनों का अध्ययन भी करते रहे । कुछ महीने पुलिस के साथ चोर-छिपौवल करके नवम्बर १९३० में ’मुहम्मद बख्स’ नाम से पकड़े जाकर , एक महीना लाहौर किले में और साढ़े तीन साल दिल्ली और पंजाब की जेलों में विताया, फिर दो मास किले में और दो वर्ष नजरबंदी में ।”
जारी……




बेहतर…
लगी आपकी यहां उपस्थिति…
रवि कुमार, रावतभाटा
नवम्बर 24, 2009 at 9:25 अपराह्न
टिप्पणी का धन्यवाद !
Himanshu Pandey
नवम्बर 25, 2009 at 5:59 पूर्वाह्न