प्रकारान्तर

जो लिख दिया अतिरिक्त

भूमिका-४ (लघु शोध प्रबंध)

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अज्ञेय

अज्ञेय

वह युग-परिवेश जिसमें अज्ञेय का परम्परा और प्रयोग से कन्धे से कन्धा मिलाकर चलना हुआ है, वह प्रगतिवादी और प्रयोगवादी दोनों का विरल सन्तुलन है । प्रगतिवादियो कवियों का उपास्य कार्ल मार्क्स है तो प्रयोगवादी कवियों का ईष्ट फ्रॉयड है । एक में ’कला जीवन के लिये है’ तो दूसरे में ’कला कला के लिये का विधान है । अज्ञेय जी ने अपनी कविता ’मैं वहाँ हूँ ’ में सबको अपनी काव्य-भूमि पर एकत्र कर लिया है । कोई ऊँच-नीच क्षुद्र-महान, जघन्य-पुण्यवान का भेद-भाव नहीं है । सभी एक रंग में रंगे हैं । देश और काल का भी कोई ध्यान नहीं है । मानव जो भी है , जहाँ भी है कवि की काव्य-सामग्री का उपकरण बन कर आ सकता है । किसी को भी कवि के गृह-द्वार से निराश होकर लौटने की आवश्यकता नहीं है । मानवीय़ सम्बंधों के नये क्षेत्रों का उद्घाटन हो रहा है । तुच्छातितुच्छ वस्तुओं को ग्रहण किया जा रहा है और अदृष्टपूर्व वातायनों के अजाने कपाट एक झटके से खोले जा रहे हैं । ऐसी-ऐसी उपेक्षित वस्तुओं की ओर ध्यान आकृष्ट किया और कराया जा रहा है जिन पर शताब्दियों से धूल की परतें जमी थीं , उन भस्मीभूत परतों के नीचे ’सत्य’ रूपी अंगार को उकेरा जा रहा है ।

अज्ञेय ने अपने काव्य में जिसकी चर्चा सुविधानुसार होगी , सब कुछ काव्य की परिधि में अन्तर्भूत करने का सुझाव दिया है । ’प्रतीक’ के एक सम्पादकीय़ में उन्होंने स्वीकार किया है कि हम विशुद्ध साहित्यिक विषयों से आगे बढ़कर साहित्य के भौतिक, दार्शनिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक आदि परिपार्श्वों से सम्बंध रखने वाली सामग्री भी प्राप्त करेंगे और इनसे तथा लौकिक जीवन से मिलने वाली प्रेरणाओं का अभिनन्दन भी करेंगे ।

इस प्रकार अज्ञेय के काव्य का विवेचन हम एक यौगिक और तात्विक दृष्टि से ओतप्रोत काम, ध्यान और अध्यात्म की पृ्ष्ठभूमि में करने का प्रयास करेंगे और यह देखना चाहेंगे  कि कैसे काम परिवर्तित और परिवर्धित होकर प्रेम की परिधि को स्नात करता हुआ ध्यान  की भूमिका   ग्रहण करता है और अध्यात्म की चेतना का चरम शिखर छू लेता है । अज्ञेय  के काव्य में काम, ध्यान और अध्यात्म का त्रिभुज कैसे निर्मित हुआ है और उनकी रचनायें कैसे पंचक्रोशी यात्रा पार करती हैं – अन्नमय कोश से आनन्दमय कोश तक की परिणिति अज्ञेय  में कैसे फलित होती है – आगे इसका ही विवेचन करने का प्रयास होगा ।

विवे्चना के क्रम में कवि के १५ काव्य-ग्रंथों को मैंने अपने  वि्वेच्य विषय के तीन श्रेणियों में विनिवेशित  किया है । कवि की रचनायें ’भग्नदूत’ (१९३३), चिन्ता(१९४२), इत्यलम(१९४६), हरी घास पर क्षण भर’ (१९४९) और बावरा अहेरी (१९५४) – इन पाँच रचनाओं को मैंने काम के अन्तर्गत रखा है । ’इन्द्रधनु रौंदे हुए ये ’ (१९५७), ’अरी ओ करुणा प्रभामय (१९५९), ’आँगन के पार द्वार’ (१९६१), कितनी नावों में कितनी बार  (१९६७) और क्योंकि मैं उसे जानता हूँ (१९६९) – इसे ध्यान के व्यापक क्षेत्र में मैंने ग्रहण किया है । कवि की मनीषा का अदभुत नवनीत उसके जीवन के उत्तर काल की पाँच रचनाओं में अभिव्यक्त हुआ है । इन्हें मैंने कवि का अध्यात्म क्षेत्र माना है । ये हैं – सागर मुद्रा (१९७१), पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ (१९७४), महावृक्ष के नीचे (१९७७), नदी की बाँक पर छाया (१९८२) और ऐसा कोई घर आपने देखा है  (१९८६) ।

कवि की काव्य-चेतना का पाथेय बड़ा ही क्लिष्ट है , विशिष्ट है और सच पूछॆं तो क्लिष्ट भी है । इसके कामादिक तीनों आयामों की पृथक विवेचना के पूर्व बता दूँ मैंने यह भी अन्वेषित करने का प्रयास किया है कि कवि की कविता ’spirituality’ का एक अनबूझ आयाम है जिसमें सप्त-चक्रों की खोज जैसा प्रयास है ।

मूलाधार चक्र कवि की भग्नदूत , चिन्ता और इत्यलम हैं । स्वाधिष्टान चक्र ’हरी घास पर क्षण भर’ बावरा अहेरी और इन्द्रधनु रौंदे हुए ये हैं । मणिपूर चक्र में ’अरी ओ करुणा प्रभामय’, आँगन के पार द्वार’ कितनी नावों में कितनी बार है । ’क्योंकि मैं उसे जानता हूँ – यह अज्ञेय की अनाहत चक्र की उपलब्धि है । सागर मुद्रा, उनका विशुद्ध चक्र है । आज्ञा चक्र की विरल उपलद्भियों में पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ, महावृक्ष के नीचे और नदी की बाँक पर छाया है , और उनक महत्तम आयास – सहस्रार चक्र की उपलब्धि जैसा की नाम से ही स्पष्ट है -वह  है ’ऐसा कोई घर आपने देखा है “।

आगे इसी परिप्रेक्ष्य में कवि की काव्य-चेतना का काम ध्यान और अध्यात्म का अनुशीलन प्रस्तुत करने का प्रयास होगा ।

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अन्य चिट्ठों की प्रविष्टियाँ -

Written by Himanshu Pandey

दिसम्बर 16, 2009 at 4:31 अपराह्न

चरित्र : दूसरों को जिंदा रखने का प्रयत्न

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हिन्दी कहानी में मानवीयता से संपृक्त लेखन के लिये उल्लेखनीय कथाकारों में एक अग्रणी नाम है ’श्री द्विजेन्द्र नाथ मिश्र निर्गुण’ । निर्गुण जी ने हिन्दी कहानी को एक विशिष्ट भाव-प्रवणता और सम्मोहक अनुभूति का गौरव दिया है । सारिका के १६-३१ अक्टूबर के अंक में प्रकाशित ’निर्गुण’ जी के  महत्वपूर्ण साक्षात्कार (कमल गुप्त/पुष्पा अवस्थी द्वारा लिया गया) का अंश आपके सम्मुख प्रस्तुत है । इससे निर्गुण के व्यक्तित्व और चरित्र का सहज परिचय प्राप्त होता है -

कमल गुप्त/पुष्पा अवस्थी - मैं यह पूछना चाहूँगा कि आज के इस हिन्दी लेखन को आप और क्या देना चाहेंगे संदेश के रूप में । एक विचार के रूप में…

’निर्गुण ’- रचनायें जो आज लिखी जा रही हैं उनमें स्वच्छता बहुत जरूरी है । और यह स्वच्छता, मन की बहुत जरूरी है । आदमी का मन गंदा हो गया है , यह गंदगी किसी तरह से हटनी चाहिये । जिस तरह से संभव हो सके गंदगी हटाये जान के हर संभव उपाय करने चाहिये । लेखक को चारित्रिक पतन से बचाया जाये । लेखक को स्वयं इससे उबरना चाहिये । यह कैसे होगा , देखिये , यह तो मैं नहीं बतला सकता , क्योंकि मेरा दृष्टिकोण यह है कि इससे व्यक्तिगत स्तर की बात आ जाती है । मैं अपने को उबार लूँ । मैं कोई गलती खुद न करूँ । मैं इतना कर सकता हूँ और लेखक इतना ही कर सकता है । अब देखिये, आप हमारे मित्र हैं , मैं आपको तो नहीं संभाल सकता । बदल सकता । पर खुद को संभाल सकता हूँ , गलत रास्ते पर जाने से खुद को रोक सकता हूँ । हम अपने चरित्र को सुधारे रहें, और इसका मतलब रिफ्लेक्शन साहित्य में जरूर होगा ।

कमल गुप्त/पुष्पा अवस्थी - निर्गुण जी, गलत और सही को परिभाषित करना फिलहाल बड़ा कठिन है । ’चरित्र’ बड़ा वेग शब्द है । हमेशा इस्तेमाल कर लिया जाता है । चरित्र बड़ा ही अपरिभाषित शब्द है जिससे अनेक तरह की व्यंजनायें निकलती हैं । आप निश्चित रूप से चरित्र को किस अर्थ में आज के लेखन में स्थापित करना चाहेंगे ?

’निर्गुण’ – आपने बड़ा अच्छा सवाल किया है । चरित्र का अर्थ सिर्फ वही नहीं है जो लोग लगाते हैं । वह बहुत सीमित है और एक कतरा है । चरित्र एक पूरी दिनचर्या और व्यक्तित्व है । सुबह उठने से लेकर रात सोने तक की सारी दिनचर्या चरित्र से संबंधित है । … कैसे हम जीते हैं, निकट के संपर्कों में आपसी रिश्तों को…?

कमल गुप्त/पुष्पा अवस्थी - जीते ही हैं सिर्फ या दूसरों को जिंदा भी रखते हैं ..

’निर्गुण’ - हाँ, दूसरों को जिंदा रखने का प्रयत्न करना चरित्र है । ऋग्वेद का एक मंत्र है, ऋषि ने कहा है कि रात को सोते समय यह याद करना चाहिये कि सारे दिन तुमने क्या अच्छा काम किया । तुमने किसी को क्या दिया । किसको देने की प्रेरणा दी । कितना सुंदर कथन है … अगर व्यक्ति की दिनचर्या में यह आ जाता है तो उसका चरित्र बन जाता है ।

……….

मेरे अन्य चिट्टों की प्रविष्टियाँ -

# तेहिं तर ठाढ़ि हिरनियाँ … (सच्चा शरणम )

Written by Himanshu Pandey

दिसम्बर 15, 2009 at 10:29 पूर्वाह्न

भूमिका-३ (लघु शोध-प्रबंध)

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स०ही०वा०’अज्ञेय’

अज्ञेय की काव्ययात्रा नयी कविता की यात्रा है । इससे निर्मित मार्ग कितने ही चरणों से चुम्बित और स्पर्शित होकर आगे बढ़ता गया है । कितने ही नये कवि इसकी सही पहचान कर सके और कितने ही इस पर चलकर अब झुठला रहे हैं । कविता में अज्ञेय ने जो मानदंड अपनाया है, जो लीक पकड़ी है वह अज्ञेय लगती हो पर अप्रिय नहीं लगती  । कवि का व्यक्तित्व झाँक लेने के बाद लगे हाथ यह मन होता ही है कि उसके कृतित्व का भी विहंगावलोकन कर लें ।

हिन्दी काव्य की विजयिनी कीर्ति-वसुंधरा का अज्ञेय नामधारी कवि ऐसा दूत है-’भग्नदूत’, जो अपनी ’चिन्ता’ को ’इत्यलम’ कहकर विरम नहीं गया, बल्कि ’हरी घास पर क्षण भर ’ बैठकर वह ’बावरा अहेरी’ कलेजा दबाये एकटक देखता रहा – पड़े हैं सामने ’इन्द्रधनु रौंदे हुए ये’ । उठे उसके सजल नेत्र ऊपर । कभीं आँखें पसारकर, कभीं आँखें बंदकर फूट पड़ा वह अस्तित्व-सर्जन के आगे – ’अरी ओ करुणा प्रभामय !’ ’आँगन के पार द्वार’ का संधान करा दे । वह ’कितनी नावों में कितनी बार’ बैठकर आता है । ’सागर-मुद्रा’ में ’महावृक्ष के नीचे’ बैठकर उद्घोषणा करता है – ’पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ’ क्योंकि मैं जानता हूँ कि किसी ने ’ऐसा कोई घर देखा है ’।

कवि ’विश्वप्रिया ’ के पाँवों पड़ा, ’सांध्यतारा’ से, प्रातः रवि से, अस्तंगत सविता से, उछलती मछली से, लहरती झील से, अंतःसलिला सरिता से, उमड़ती सागर बेला से, बासन्ती झुरमुट से, बाजरे की कलगी से, आँगन के द्वार से, द्वारहीन द्वार से, रूप अरूप से, चक्रान्त शिला से, असाध्य-वीणा से – किससे, किससे नाता नहीं जोड़ता है, कहाँ-कहाँ नहीं रोता है, निज को कहाँ-कहाँ नहीं खोता है, और जो चिन्तन प्रसूत रत्न संग्रह करता है प्रेम से उसे लुटा देता है । अज्ञेय की काव्य-यात्रा को इस तरह अपनी रचनाओं में निम्न पड़ाव देखने पड़े हैं -

  1. चिन्ता (१९४२)
  2. इत्यलम (१९४६)
  3. हरी घास पर क्षणभर (१९४९)
  4. बावरा अहेरी (१९५५)
  5. इन्द्रधनु रौंदे हुए ये (१९५७)
  6. अरी ओ करुणा प्रभामय ! (१९५९)
  7. आँगन के पार द्वार (१९६१)
  8. कितनी नावों में कितनी बार (१९६७)
  9. क्योंकि मैं उसे जानता हूँ (१९६९)
  10. सागर मुद्रा (१९७०)
  11. पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ (१९७४)
  12. महावृक्ष के नीचे (१९७७)
  13. नदी की बाँक पर छाया (१९८१)
  14. ऐसा कोई घर देखा है (१९८६)

इस प्रकार उनका काव्य सब प्रकार की विरोधी और साम्य युक्तियाँ लेकर चला है और सब उनमें सहज ही आ गये हैं  क्योंकि वे अज्ञेय जो हैं । उनके कृतित्व-व्यक्तित्व को विराम दे रहा हूँ डॉ० विद्यानिवास मिश्र के शब्दों के साथ -

“अन्तःस्मित अन्तःसंयत हरी घास की तरह नमना, ’खुल-खिलना’, ’सहज मिलना’ , एक साथ इतिहास, अपने चेहरे, परम्परा, मुकुट, बालकों के भवितव्य के भोले विश्वास के प्रति उत्तरदायित्व अपने ऊपर ओढ़ लेना, ’इयत्ता की तड़प के साथ उछली हुई मछली को सागर के सन्दर्भ में आँकना’ ’सीमाहीण खुलेपन’ के लिये प्रयत्न करते हुए भी ’विशाल में बह न सकने’ की असमर्थता का ज्ञान, शब्द को ’नैवेद्य’ मान कर बाँटते हुए भी ’मौन की अभिव्यंजना’ मानना, ’जीवन की धज्जियाँ उड़ाकर भी ’ जीवन के लिये पने को निरन्तर उत्सर्ग करते रहना, आशा के बिना भी निरांतक रह सकना – ये गुण अज्ञेय में आकस्मिक नहीं हैं ।”

जारी …..

Written by Himanshu Pandey

दिसम्बर 13, 2009 at 4:01 अपराह्न

भूमिका-२ (लघु शोध प्रबंध)

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’धर्मवीर भारती’ ’कुछ चेहरे कुछ चिन्तन’ में सन्नाटे का छन्द नामक फिल्म का उद्धरण देते हुए कहते हैं –

"एक समुद्र है । कहाँ का है, कुछ पता नहीं चलता । पुरी का समुद्र होता तो विराट सर्पाकार लहरें उमड़-उमड़कर इस तरह लपकतीं मानो सारी पृथ्वी को निगल जायेंगी, बम्बई का समुद्र होता तो लहरें जरा घूम कर आतीं, तट का कूड़ा-कर्कट, तिनके, कागज, पत्ते बटोर कर ले जातीं और छोड़ जातीं कुछ सीपियाँ, कुछ घोंघे, कुछ मछलियों के पंख; कोवालम का समुद्र होता तो दूर तक फैली रेत को किनारे-किनारे से छूता, सहमता, बीच के रेतीले द्वीपों में शर्माया सा खड़ा रहता – पर यह तो पता नहीं कहाँ का समुद्र है, दायें  बायें चट्टानें हैं – लम्बी, पतली पत्थर की शहतीरों जैसी, जिनमें गहरा नीला सागर जल फँसा हुआ । उस जल में ज्वार की उत्ताल तरंग नहीं, लहरीली हलचल मात्र है, जो कहीं जाती नहीं, कहीं से आती नहीं बस अपनी ही जगह पर जड़ी हुई, गतिशील नहीं, केवल स्पन्दनशील है । लेकिन जो सागर ध्वनि सुनायी पड़ती है वह शिलाओं से घनघोर टक्कर लेते तूफानी समुद्र की है । मानों शिलाओं के नीचे भूकम्प की गड़गड़ाहट हो, ऊपर समुद्र की दहाड़ । उस उच्छॄंखल बड़बोले शोर को दबाटि हुई एक सौम्य, सुस्पष्ट और सधी हुई आवाज और फिर आकृति उभरती है – अज्ञेय की । वे पढ़ रहे हैं अपनी कविता – "मैं एक तनी हुई रस्सी पर नाचता हूँ ।"

भारती जी आगे लिखते हैं – "इस चित्र में अज्ञेय स्वयं अपने बारे में कुछ बातें करते हैं  । कुछ व्याख्यायें, कुछ संस्मरणात्मक  आत्मकथ्य, कुछ प्रतिवाद, कुछ स्पष्टीकरण ……. अपने वक्तव्य में अज्ञेय बताते हैं कि सबसे पहली और महत्वपूर्ण चीज जो उनके साथ घटी, वह थी उनके नितान्त अकेले बचपन की अनुभूति । वे कई भाई बहन थे । उनके पिता श्री हीरानन्द शास्त्री प्रख्यात पुरातत्त्ववेत्ता थे और अक्सर वे कैम्प डालकर खुदाई जहाँ चल रही हो ऐसे निर्जन स्थानों में रहते थे । सच्चिदानन्द को पिता के साथ यात्राओं पर जाने का शौक था । उन निर्जन स्थानॊ पर खुदे हुए टीलों के पास पहाड़ी की ढलान पर, नदी के किनारे घण्टों चुपचाप बैठा रहता था यह बच्चा । आसपास न कोई आदमी न कोई आदमजाद । सिर्फ सन्नाटा बुनती हवा, हाथ हिलाते पत्ते, शर्मीली देहाती नदी और अकेलापन । इस चरम एकाकी बचपन का क्या प्रभाव हुआ उन पर यह तो उन्होंने वक्तव्य में नहीं बताया पर बालमनोविज्ञानवेत्ता इसके कई अर्थ निकाल सकते हैं । चरम एकाकी बच्चा फूल-पत्तियों, नदियों, पक्षियों से जुड़कर उनसे आत्मीयता स्थापित कर अत्यन्त करुणामय, संवेदनशील सहज स्वाभाविक भी हो सकता है, पर दूसरी ओर नितान्त एकाकी बच्चा भीड़भाड़ से डरने वाला सहज सामाजिक जीवन से अलग-थलग रहने वाला, ऊपर से तननेवाला और अन्दर से झुकने वाला, डरा हुआ, हर पत्ते के खडकने पर सचेत और सन्नद्ध होने वाला भी हो सकता है । एक तीसरी स्थिति और हो सकती है – चरम एकाकी बच्चा प्रारम्भ में सहज सामाजिक रिश्तों के अनुशासन न होने के कारण कठोर, आत्मकेन्द्रित और थोड़ा हिंसक भी हो सकता है ।

इस प्रकार अज्ञेय की प्रारंभिक शिक्षा घर पर हुई क्योंकि प्राइमरी पाठशाला के प्रति अरुचि थी । उच्च शिक्षा मद्रास और लाहौर में हुई । बचपन उन्होंने लखनऊ, काश्मीर, बिहार और मद्रास में बिताया । सन १९२९ में फार्मन कॉलेज लाहौर से बी०एस-सी परीक्षा प्रथम श्रेणी में उतीर्ण की । १९३० में अंग्रेजी से एम०ए० का अध्ययन प्रारंभ किया, किन्तु क्रांतिकारी दल में भाग लेने के कारण गिरफ्तार हुए और लगभग चार वर्षों तक बन्दी जीवन व्यतीत किया ।

सम्पादन कला में अपनी पटुता उन्होंने सैनिक (आगरा), ’बिजली"(पटना) तथा ’विशाल भारत’ (कलकत्ता) के सम्पादन में दिखायी । सन १९४० से १९४२ तक किसान आन्दोलन में रहे । सन १९४३ से ४६ तक सेना में कैप्टन रहे । फिर सन ४७ में प्रयाग से नवलेखन की सुप्रसिद्ध पत्रिका ’प्रतीक’ निकाली । सन १९५० से ५५ तक आकाशवाणी की सेवा में रहे । सन १९५५ से ६० तक क्रमशः यूरोप पूर्वी एशिया और जापान का भ्रमण करते रहे । जन्मजात विदोही कलाकार और यायावर रहे । तारसप्तक के प्रकाशन ने आपकी प्रतिष्ठा में चार चाँद लगाया । ’चिन्ता ’ में लिखा आपका वक्तव्य द्रष्टव्य है – "मैं था कलाकार सर्वतोन्मुखी निज क्षमता का अभिमानी ।" इस प्रकार उन्होंने स्वयं को यायावर भी कहा है । तारसप्तक के आत्मपरिचय में लिखते हैं –

"जन्म मार्च १९११ में एक शिविर में हुआ । उसी से आवारगी की छाप पड़ी हुई है और धाम पूछने पर प्रायः उत्तर मिलता है रेलगाड़ी में ।"

अपनी ’अरे यायावर रहेगा” याद पुस्तक में  इस यायावरी वृत्ति का और भी स्पष्टीकरण उन्होंने किया है । सच पूछिये तो जनाब राहुल सांकृत्यायन के नूतन परिवर्द्धित संस्करण ही रहे ।

जब इनके व्यक्तित्व की ओर दृष्टिपात करता हूँ तो डॉ० शान्ति स्वरूप गुप्त का कथन स्मृति में आ जाता है –

"अज्ञेय सुशिक्षित  और सुसंस्कृत व्यक्तित्व के धनी हैं…उनका मन और मस्तिष्क दोनों प्रौढ़ हैं- एक ओर संवेदनशील कवि हृदय है तो दूसरी ओर वह गम्भीर चिन्तक हैं ….. काव्य के प्रति उनका दृष्टिकोण अन्वेषी का है ….. पाश्चात्य सहित्य का व्यापक अध्ययन और मन्थन करने और आधुनिकता से निकट सम्पर्क होने पर भी अज्ञेय मूलतः भारतीय हैं ।… अज्ञेय का साहित्यिक व्यक्तित्व टी०एस०ईलियट व जॉनसन के निकट है । उनका काव्य व्यक्तित्व एक साथ वर्तमान, अतीत और भविष्य की ओर उन्मुख रहा है ।"

अज्ञेय का १९८७ में स्वर्गारोहण हिन्दी साहित्य का वह रिक्त स्थान है जिसकी पूर्ति बहुत दिनों तक असम्भव सी लग रही है । अंत में डॉ० विद्यानिवास मिश्र के शब्दों में कह सकते हैं –

"एक जिन्दादिल आदमी की तरह वे अच्छे भोजन का स्वाद जानते हैं, अच्छी रहन सहन की परख रखते हैं, पर इसके साथ ही फकीर ऐसे हैं कि फटे जूतों में बर्फीली सड़कों पर दिन में बीस-बीस मील पैदल घूम सकते हैं । संग्रह करते रहेंगे और एक दिन सब बाँट-बूँटकर निर्द्वन्द्व हो जायेंगे । गृहस्थी की हुनर भी जानते हैं, मन से अनिकेत हैं ।"

ऐसा औघड़ आदमी फागुन में ही जन्म सकता था, ’फरे फागुन बीच’ जनम लेने वाला आदमी ही जहाँ रंग-बिरंगे फूलों में सजता है, वहीं संवत की धूल में भी । वह पलाश के साथ दहकता है तो पिचकारियों के साथ भींगता भी है । वह जितना ही निर्बंध है, उतना ही आनुशासित । बसन्त उसका प्रारंभ है, प्रथम चरण है । वह ग्रीष्म के अन्धड़ झेलने वाला, दामिनी की दमक झेलने वाला, शरद की शुभ्रता में परिणित पाने वाला कलाकार है ।

Written by Himanshu Pandey

नवम्बर 29, 2009 at 2:27 अपराह्न

भूमिका (लघु शोध-प्रबंध)

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’अज्ञे्य’

अज्ञेय का काव्य किस विधा से प्राणवान हुआ है, यह मौन, सन्नाटा बुनने वाला कवि किस तरह काव्य में मुखर हुआ है, इसकी गम्भीर विवेचना के पूर्व कवि का संक्षिप्त व्यक्तित्व एवं कृतित्व आलोड़न में लेना समीचीन ही नहीं, आवश्यक भी है । डॉ० विद्यानिवास मिश्र ने लिखा है -

“हिन्दी कविता के इतिहास  में अज्ञेय का नाम इस प्रकार दुर्निवार बन गया है कि जो लोग इस नाम को निकालना भी चाहते हैं, वे भी इस नाम को भूल नहीं पाते ।”

बहुमुखी प्रतिभा का कलाकार, छायावादोत्तर काल की हिन्दी कविता का सुमेरु पुरुष, प्रयोगवाद का प्रवर्तक तथा नवीन काव्य चेतना का सूत्रधार ’अज्ञेय’ नामधारी कवि अक्षय कीर्ति का अधिकारी है । अपनी विलक्षण प्रतिभा द्वारा हिन्दी कविता में आमूल क्रान्ति उपस्थित करने वाले कवि अज्ञेय की व्यक्तिगत जीवनी अनिवार्यतः ज्ञातव्य नहीं, किन्तु मूल्यवान अवश्य है । इसका मूल्य उस समय है जब वह कवि के व्यक्तित्व की मूलभूत प्रेरणाओं को प्रकाश में लाये । वैसे अन्ततः कवि के व्यक्तित्व का उत्तम परिचायक स्वयं उसका काव्य होता है । क्योंकि वही उसका श्रेष्ठ कर्म है । उसकी चरम उपलब्धि और अभिव्यक्ति है ।

इनके आविर्भाव को चित्रित करते हुए डॉ० विद्यानिवास मिश्र कहते हैं -

“आज फागुन सुदी सप्तमी है । भाई (सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय) का जन्मदिन है । आज के दिन खंडहरों में खुदाई के लिये लगे शिविर में १९११ (सात मार्च) में कुशीनगर के शालवन में उनका जन्म हुआ । बचपन में उन्हें ’सच्चा’ कहा जाता था । जेल में उन्हें उनके साथियों ने ’हाथी भाई’ कहना शुरु किया । बाद में उसी का संक्षिप्त रूप भाई शेष रह गया । इनके पिता ’पं० हीरानन्द शास्त्री पुरातत्त्ववेत्ता थे । उनके साथ जीवन का अधिकांश देशाटन में व्यतीत हुआ । पिता के साथ संस्कृत साहित्य और भारतीय कलाओं का अध्ययन उन्हॊंने किया । अपनी मुख्य अभिरुचि साहित्य बताते हुए अपने विषय में उन्होंने लिखा है -

“साहित्य के साथ बमबाजी और विषैले रसायनों का अध्ययन भी करते रहे । कुछ महीने पुलिस के साथ चोर-छिपौवल करके नवम्बर १९३० में ’मुहम्मद बख्स’ नाम से पकड़े जाकर , एक महीना लाहौर किले में और साढ़े तीन साल दिल्ली और पंजाब की जेलों में विताया, फिर दो मास किले में और दो वर्ष नजरबंदी में ।”

जारी……

Written by Himanshu Pandey

नवम्बर 24, 2009 at 8:59 पूर्वाह्न

प्रस्तावना (जारी…)

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अपने एक निबंध कुटज में ’हजारी प्रसाद द्विवेदी ’ ने लिखा है -

“नाम में क्या रखा है, कोई भी नाम रख लो ।”

हो सकता है यह बात अधिकांश स्थानों पर सत्य हो किन्तु सर्वत्र इसकी सत्यता संदिग्ध ही है । परमात्मा के विविध नामो की चर्चा में गोस्वामी तुलसीदास ने एक कदम आगे बढ़कर अपना ’वीटो पावर’ (Veto Power) लगाया था -

“यद्यपि प्रभु के नाम अनेका । श्रुति कँह अधिक एक ते एका ।

राम सकल नामन ते अधिका । होउ नाथ अघ खग गन बधिका ।”

जहाँ तक अज्ञेय नाम का संबंध है, यह नाम भी मुझे कम अर्थवाह प्रतीत नहीं हुआ । ’अ’ वर्णमाला का पहला अक्षर, ’ज्ञ’ वर्णमाला का अंतिम अक्षर । दोनों मिलकर ’अज्ञ’ हुए । ’अ’= सम्पूर्ण । ज्ञ= ज्ञान । ’अज्ञ= अखिलं ज्ञायते येन, अर्थात जिसे सब पता हो वह हुआ ’अज्ञ’ और सारे ज्ञानों से संपृक्त व्यक्तित्व का नाम ’अज्ञेय’ । अज्ञेय नाम कवि वात्स्यायन से ऐसे चिपक गया है जैसे त्वचालिप्त मांस-पिंड । इसलिये यथा नाम तथा गुण के कारण अज्ञेय मुझे बहुत प्रिय हैं । अज्ञेय का अर्थ मूर्ख करने वाली व्याख्या से हम बाद में निपट लेंगे । वैसे न जानने योग्य या अज्ञात व्यक्तित्व समझकर अज्ञेय उपनाम जैनेन्द्र ने उन्हें दे दिया जो दिल्ली जेल से भेंजी गयी इनकी कहानी के साथ जैनेन्द्र जी ने बनारस के जागरण में भेंज दी । स्वयं को अज्ञेय को यह नाम प्रिय नहीं था, परन्तु ” एक बार चल गया तो चल गया ” ।

अज्ञेय की इस बहुश्रुत बहुज्ञ कारयित्री प्रतिभा को सादर स्मृति में लेते हुए मैंने अपने परियोजना कार्य में अज्ञेय को ही चुना है । ’अज्ञेय के काव्य में काम, ध्यान और अध्यात्म’ के विवेचन का मेरा प्रयास है । वैसे तो यह बौने का आकाश चूमने जैसा प्रयास है, या कालिदास की भाषा में कहें – “ततुं उडुपेनापि सागरम” जैसा कार्य है, फिर भी अज्ञेय के काव्य की विशिष्ट एवं अदभुत गरिमा ने मुझे यह कार्य सम्पन्न करने का साहस प्रदान किया है , और इसी का प्रतिफल है यह निबंध ।

इत्यलम !

Written by Himanshu Pandey

नवम्बर 21, 2009 at 7:58 अपराह्न

प्रस्तावना ( लघु शोध प्रबंध )

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अपने स्नातकोत्तर ’हिन्दी’ द्वितीय वर्ष के अध्ययन क्रम में पंचम प्रश्न पत्र की आवश्यकता को दृष्टिगत रखते हुए प्रस्तुत प्रबंध को परियोजना कार्य के लिये प्रस्तुत करते हुए मुझे हर्ष है । हिन्दी साहित्य का एक विशाल फलक है और हमें गर्व है कि हमारा आधुनिक हिन्दी साहित्य विश्व के श्रेष्ठ साहित्य से किसी भी अर्थ में न्यून नहीं है । मध्यकालीन सगुण भक्ति साहित्य में जैसे गोस्वामी तुलसीदास एक दीप्त नक्षत्र के रूप में चमकते रहे वैसे ही आधुनिक हिन्दी साहित्य के काव्य-क्षेत्र में ’अज्ञेय जी एक क्लासिक बन गये हैं । अब तक की मनीषा को तो यही लग रहा है कि नयी कविता के हिन्दी साहित्याकाश में ’अज्ञेय’ जैसा  ’न भूतो न भविष्यति’ । मुझे आधुनिक युग में प्रसाद के बाद सबसे प्रभावित करने वाले कवि अज्ञेय ही हैं । इसलिये मैंने अपना प्रोजेक्ट वर्क अज्ञेय पर केन्द्रित किया है । ऐसा व्यक्तित्व और ऐसा कृतित्व हिन्दी क्या विश्व साहित्य में शायद ही कहीं खोजे मिले । कहाँ अज्ञेय मौन हैं, कहाँ मुखर हो गये हैं , इसे ज्ञात करने में बुद्धि को गहन अनुशीलन करना पड़ता है । कहा नहीं जा सकता, अज्ञेय का काव्य मुखर मौन है, या मौन मुखरता है । सन्नाटे को भी पढ़ लेने वाले , शून्य में भी तूलिका चलाने वाले ऐसे कवि पर हिन्दी साहित्य को गर्व क्यों न हो !

 

जारी……..

Written by Himanshu Pandey

नवम्बर 21, 2009 at 7:37 अपराह्न

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As i am a new user at WordPress, i am now unknown to write in Hindi, I am starting my blogging through my First post in English. This is my first poem in English written in 1998.

 

I hankered after the stars to kiss

and wished to embrace the moon light bliss;

But all my deeds were useless bark

I nithing received but dark and dark.

 

In every proceeding there pricked me spears

In searc of peace I got but tears;

My sweet traquility turned to spark

I nithing received but dark and dark.

 

I never desired the loving to miss

But ah! was snatched away my dish;

My trecheries all were above the mark

I nithing received but dark and dark.

Written by Himanshu Pandey

नवम्बर 4, 2008 at 3:25 अपराह्न

Posted in My Poems

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